विरोधाभासी जिन्दगी….

“कभी खुशी से, या फिर बेमन,
साँस साँस यूँ चलता जीवन,
खोया पाया यहीँ छोड कर,
एक दिन मिट्टी हो जाता तन”

बचपन, यौवन और वृद्धावस्था- जीवन के पडाव हैं,
इन पडाओं के साथ आते अनगिनत घुमाव हैं.

सुख-दुख, खोने पाने के उतार चढाव हैं,
कभी सुकून के हल्के क्षण तो कभी तनाव है.

कभी नफरत तो कभी फिर झुकाव है,
कभी मित्रता का आनन्द तो कभी मनमुटाव है.

कभी विचारों की दृढता तो कभी भावनाओं के बहाव हैं,
कभी आक्रामकता तो कभी फिर बचाव है.

कभी सद्भाव तो कभी दुर्भाव है,
कभी समझौता तो कभी फिर टकराव है.

किसी से जुडाव तो किसी से अलगाव है,
कभी संगठन तो कभी फिर बिखराव है.

गैरों के ताने तो मित्रों के सुझाव हैं,
आपाधापी के इस जीवन मे चैन और शान्ति का ाभाव है…

मै चकित हूँ—
इतने विरोधाभासी और क्षणभंगुर जीवन से हमे आखिर इतना क्यूं लगाव है????/
——

Published in: on अक्टूबर 27, 2007 at 11:33 अपराह्न  Comments (11)  

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11 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. कत़रा कत़रा मिलती है…., कतरा कतरा जीने दो…
    जिन्दगी है,
    यही कह सकता हूँ।

  2. आपकी यह कविता तो अच्छी है, साथ ही अंत में प्रस्तुत प्रश्न भी विचारणीय है। यदि सही सही इसका उत्तर ही जान जायें या फिर जानने का सत्यता से प्रयास ही करें तो मेरा ऐसा विचार है कि तब यह प्रश्न शायद निरर्थक हो जाय। हमारी आत्मिक विकृतियाँ ही शायद इसे लगाव बना रहने देतीँ अन्यथा उपरिवर्णित विषमताओं के रहते भी कदाचित हम आनन्द में रहें।

  3. Mujhe Gulzar sahab ki likhi woh geet…” ai zindagi gale laga le…humne bhi tere har ek gham ko gale se lagaya hai…hai na?”

    khush rahein sada yehi dua hai

  4. जीवन है क्या
    मतिभ्रम जैसा
    ना जानूँ मैं
    ना कोई जाने
    बदल जायेगा
    एक पल में वो
    जो है अच्छा
    और बुरा जो
    मत चिंता कर
    बस तू जी ले
    जो है जीवन
    मधुरस सम तू
    उसको पी ले
    थोड़ा जी ले

  5. जीने की इच्छा सबसे बड़ा और आकर्षक सच है। अच्छा लगा कि फिर से लिखना शुरू हुआ।

  6. विरोधाभास हैं इसलिए जो कुछ अच्छा है उससे लगाव भी है…

  7. रचना, मैं भी चकित हूँ।

  8. सभी चकित हैं, रचना जी बस आपने इस भाव को सुन्दर शब्द रुप दे दिया. बहुत गहरे पैठे प्रश्नों को उभारा है. जबाब भी मिलेगा. जब गहरे उतरे हैं तो मंथन भी होगा और माखन उपर आकर मंथन को साकार एवं सार्थक करेगा..शर्त है मथते रहिये.

    बहुत सुन्दर लग रहा है कि आपने पुनः कलम थामी है. अब तरह तरह के आकार नये आयामों को उभारेंगे. बहुत शुभकामनायें आने वाली अनेकों संभावनाओं के लिये.

  9. जीवन के विरोधाभासो‍ पर आपके विचार रखने के लिये आप सभी का शुक्रिया…

    काकेश, पन्क्तिया‍ मुझे बहुत बहुत पस‍द आई‍. धन्यवाद इन्हे यहां लिखने के लिये…

  10. आपकी रचनायें प्रभावित करती हैं। अफसोस मैंने जरा देर से पढा।

  11. अनुराधा जी, टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!


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