आशा- निराशा….

सपने बुनती हूँ, टूट जाते हैं,
टूटकर बिखर जाते हैं,
उनमे से एक टुकडा चुनकर,
फिर सपने बुनने लगती हूँ…

आशाएँ जगाती हूँ, टूट जाती है,
निराशा आती है,
दुख के काँटों के बीच,
सुख के कुछ फूल चुनने लगती हूँ…..

प्रयास करती हूँ, विफल हो जाते हैं,
सहम जाती हूँ,
विफलता के अन्धकार के उस पार,
रोशनी की किरण ढूँढने लगती हूँ……

हिम्मत जुटाती हूँ, हार जाती हूँ,
थम जाती हूँ,
फिर चुपचाप हाथ पर हाथ रख,
 नियति की सुनने लगती हूँ……

Published in: on नवम्बर 21, 2007 at 1:17 पूर्वाह्न  Comments (18)  

रोटी……

“भाजी पोळी देणार का? “( सब्जी रोटी दोगी क्या?)
कभी कभी सुबह मेरे घर के बाहर से ये आवाज मुझे सुनाई देती है…. छोटे छोटे २/३ गरीब बच्चे खाना माँगते हैं…पहले जब कभी कुछ रखा होता था तो मै उन्हे दे देती थी, लेकिन अब उनके लिये बचा कर रखने लगी हूँ…. कुछ नही होने पर चॉकलेट देती हूँ, जिसे  वे बहुत खुश होते हुए बाँट कर खा लेते हैं….
मुझे अच्छे नही लगते वे सम्भ्रान्त लोग जो गरीब लोगों को बेहूदगी से झिडक देते हैं ( वे कुछ नही देना चाह्ते तो भले ही न दें)…..उन्हे लगता है कि भीख माँगने को  एक पेशा बना लेते हैं लोग..एसा हो सकता है, लेकिन क्या पता कोई गरीब सच मे ही भूखा हो… कभी कभी ऐसे दृश्य देखने को मिल जाते हैं………..

एक घर के सामने सडक बन रही थी,
गरीब मजदूरिन वहाँ काम कर रही थी.

मजदूरिन के घर का सारा बोझ उसी पर पडा था,
उसका नन्हा सा बच्चा साथ ही खडा था.

उसके घर के सारे बर्तन सूखे थे,
दो दिन से उसके  बच्चे भूखे थे.

बच्चे की निगाह सामने के बँगले पर पडी,
देखी, घर की मालकिन, हाथ मे रोटी लिये खडी.

बच्चे ने कातर दृष्टि मालकिन की तरफ डाली,
लेकिन मालकिन ने रोटी, पालतू कुत्ते की तरफ उछाली.
कुत्ते ने सूँघकर रोटी वहीं छोड दी,
और अपनी गर्दन दूसरी तरफ मोड दी!
कुत्ते का ध्यान, नही रोटी की तरफ जरा था,
शायद उसका पेट पूरा भरा था!

ये देख कर बच्चा गया माँ के पास,
भूखे मन मे रोटी की लिये आस.

बोला- माँ! क्या रोटी मै उठा लूँ?
तू जो कहे तो वो मै खा लूँ?

माँ ने पहले तो बच्चे को मना किया,
बाद मे मन मे ये खयाल किया कि-

कुत्ता अगर भौंका तो मालिक उसे दूसरी रोटी दे देगा,
मगर मेरा बच्चा रोया तो उसकी कौन सुनेगा?

माँ के मन मे खूब हुई कशमकश,
लेकिन बच्चे की भूख के आगे वो थी बेबस.

माँ ने जैसे ही हाँ मे सिर हिलाया,
बच्चे ने दरवाजे की जाली मे हाथ घुसाया.

बच्चे ने डर से अपनी आँखों को भींचा,
और धीरे से रोटी को अपनी तरफ खींचा!

कुत्ता ये देखकर बिल्कुल नही चौंका!
चुपचाप देखता रहा! जरा भी नही भौंका!!

कुछ मनुष्यों ने तो बेची सारी अपनी हया है,
लेकिन कुत्ते के मन मे अब भी शेष दया है…….
—————

…….कितनी अजीब बात है कि हम अपने मित्रों और रिश्तेदारों को ( जिनके पेट पूरे भरे होते हैं और जो प्लेट मे रखा नाश्ता जूठा करके छोड देते हैं या चाय मे जरा सी चीनी कम या ज्यादा होने पर मीन मेख निकालते हैं!) बुला बुला कर खिलाते हैं लेकिन किसी गरीब को देते वक्त हमे तुरन्त ये खयाल आता है कि दो दिन मुफ्त मे खा लेगा तो इसे आदत हो जायेगी……..

Published in: on नवम्बर 7, 2007 at 12:29 पूर्वाह्न  Comments (13)  

मै तो मालामाल हो गयी!!!

अरे नही! मेरी कोई बम्पर लॊटरी नही खुली है बल्कि पिछली पोस्ट मे मैने जिस ’सुविधा गणित’ का  जिक्र किया है उसके हिसाब से मै मालामाल हो गयी!
मेरी पिछली पोस्ट जिन विविध चिट्ठाकार( उनके ब्लॊग लेखन की दृष्टि से) ने पसँ‍द की और टिप्पणी की उसे अगर ’सुविधा गणित’ के हिसाब से देखा जाये तो उस पोस्ट को अच्छा प्रतिसाद मिला है…
उस गणित मे कुछ और सूत्र भी इस्तेमाल किये जाने चाहिये जैसे कि–

आपने अपने ब्लॊग और अपनी पोस्ट पर कितनी मेहनत की है यानि  उसके लिये कितनी किताबें पढीं, कितना वक्त टाइपिंग मे लगाया और अन्य चीजे जैसे- फ़ोटो, लिन्क, और रंगीन या बोल्ड अक्षर इत्यादि.
यदि बहुत तामझाम के बाद कुछ ही टिप्पणियाँ मिली हैं तो अपने जोड मे से कुछ अंक कम कर लें…..
यदि बिना किसी तामझाम के अच्छी टिप्पणियाँ मिली हैं तो कुछ अंक बोनस ले ले 🙂

खैर ये सब (और इस पोस्ट का शीर्षक भी!) मजाक की बातें हैं..सच यही है कि टिप्पणियों का कोई हिसाब किताब नही होता, गुणवत्ता होती है!
कुछ लोगों के लेखन और उससे उभरे उनके व्यक्तित्व हमारी निजी पसँद होते हैं (जैसे मेरे लिये बेजी, डॉन और घुघुति बासुति जी आदि. पुरुष वर्ग का नाम नही लूँगी क्यों कि उनमे स्पोर्टिंग स्पिरिट दिखाई नही देती 🙂 ).

कुछ लोगों के प्रति हमारा खास सम्मान होता है और ऐसे लोगों की टिप्पणियाँ अंनमोल होती हैं , तो ऐसी टिप्पणियों को किसी गणित मे न उलझाएँ…..

बेजी ने अपनी टिप्पणी मे सच ही कहा कि मेरी पोस्ट अधूरी है. कई दिनो से मैने कोई भी चिट्ठे और टिप्पणियां पढे ही नही है‍ तो ठीक से विश्लेषण कर पाना सम्भव भी नही था और उचित भी नही. जो बातें मैने कही वे सामान्य मानवीय( चिट्ठाकारीय) व्यवहार के तहत कही है…

बसन्त आर्य जी ने कहा है कि टिप्पणी सफलता का माप दंड नही है, ये सच भी है और नही भी… मेरे सबसे ज्यादा पसंदीदा ब्लॉग मे से कुछ पर ( जिनकी हर पोस्ट  ( पिछले कुछ महीने छोडकर ) मैने पढी है!).मैने आज तक एक भी टिप्पणी नही की है! कई बार चिट्ठाकार की छवि इतनी बडी होती है कि आप कुछ कह नही पाते. एसा लगता है कि जिसने अभी बैट पकडना सीखा हो वो सचिन को कहे कि आप अच्छा खेलते हो! (* कुछ अजीब सी तुलन कर दी है लेकिन अभी और कुछ सूझ नही रहा है तो इसी से काम चला लें!, आशा है आप समझ लेंगे कि मै क्या कहना चाह रही हूँ*)….

कई बार समीक्षात्मक ब्लॉग ( मनीष कुमार), शोधात्मक ( सृजनशिल्पी, अफलातून) तथ्यात्मक ( उन्मुक्त) किस्म के चिट्ठों पर भी कहने को कुछ नही होता…..

कई बार टिप्पणियाँ पूर्वाग्रह से पीडित और एक पोस्ट के बजाए उस लेखक के समग्र लेखन को ध्यान मे रखकर कर की जाती हैं

मै किसी भी चिट्ठाकार की कई सारी पोस्ट पढने की बाद ही उस चिट्ठे पर टिप्पणी कर पाती हूँ…
.

मेरे लिये मेरे चिट्ठे की सारी टिप्पणियाँ अनमोल हैं, क्यों कि जब मै चिट्ठाजगत से परिचित हुई तो उसके पहले अपने घर और परिवार के बाहर की दुनिया ज्यादा नही जानती थी, उतनी ही दुनिया को जानती थी जितनी बातें अखबारों और टी वी से मेरे घर मे आती….अन्तरजाल और चिट्ठाजगत से परिचित होने के बाद एक नई दुनिया को जाना….जब मैने लिखना शुरु किया तब मुझे अपनी जानकारी, शब्द सामर्थ्य और अभिव्यक्ति पर भरोसा नही था  लेकिन कालान्तर मे मैने जाना कि भाषा के सौन्दर्य से ज्यादा जरूरी है उससे सम्प्रेषित होने वाला अर्थ….

बहुत सी बाते मैने यहीं सीखी, जो मै अन्यथा नही जान पाती…दुनिया की कई अच्छी पुस्तकों के बारे मे भी मैने यहीं से जाना….ये भी जाना कि तथाकथित बुद्धीजीवी लोग भी सामान्य मानवीय वृत्तियों से पीडित होते हैं, यानि अवान्छित भाषा का प्रयोग , दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश इत्यादि….

Published in: on नवम्बर 5, 2007 at 1:05 पूर्वाह्न  Comments (13)