असामयिक….

 

 

 

एक असामयिक मौत, कई जिन्दगियाँ निगल जाती है.

सपने टूट जाते हैं, आशाएँ पिघल जाती हैं..

 

अँधेरी रात का सन्देश दे, शाम सूरज ढल जाता है,

एक रोशनी भरा दिन हाथ से फिसल जाता है..

 

 

हर सीधा रास्ता, चौराहा सा बन जाता है,

वक्त भी हक्काबक्का सा मानो वहीं थम जाता है

 

एक पल मे अनायास सब कुछ बदल जाता है,

जिन्दगी का मकसद भी पहले सा नही रह जाता है..

 

जीने के नाम पर साँसें आती जाती हैं,

अपने पर अनचाही बेचारगी लद जाती है

 

सच्चे दुख को पीछे रख, झूठी खुशी दिखाइ जाती है,

आँख के आँसू छुपा, होठों पर मुस्कान फैलाई जाती है..

 

जिन्दगी इतना क्यूँ सताती है,

मौत सबकी तय है फिर इतना क्यूँ रुलाती है

 

—————–

 

*****

क्या बताऊँ कितनी अनमोल थी जिसे मैने खोया है,

उसकी मौत पर, ईशवर भी आकर रोया है…….

Published in: on जुलाई 31, 2008 at 4:28 अपराह्न  Comments (7)  

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7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. जीने के नाम पर साँसें आती जाती हैं,
    अपने पर अनचाही बेचारगी लद जाती है…

    घटनाओ के बाद यही सब होता है…. कितने ही परिवार ऐसे ही सोच कर गुजरते हैं

  2. “हर सीधा रास्ता, चौराहा सा बन जाता है,

    वक्त भी हक्का-बक्का सा मानो वहीं थम जाता है…”

    बहुत उम्दा… बेहतरीन…
    बहुत खूब.

  3. हर सीधा रास्ता, चौराहा सा बन जाता है,
    वक्त भी हक्का-बक्का सा मानो वहीं थम जाता है…

    गहरी सोच दिखी इन पंक्तियों में ! बहुत खूब

  4. बहुत खूब। बहुत अच्छी कविता।

  5. बहुत खूब. बहुत अच्छी रचना.

  6. wow …simply excellent

  7. अपनों का बिछोह, अपनों की मीठी यादें, और कभी न वापस मिल पाने की घुटन….बेहद मार्मिक. बस!!!


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