गांव के मेले मे……..

*** मैने कल कल क्यूं कुछ नही लिखा, इस बात को भूल जाईये!
आईये!
आज मेरे साथ, जरा सा मुस्कुरा इये!! 🙂

** जिन्दगी मे अजीब इत्तफ़ाक हो जाते हैं… ये देखिये–

एक लडके और एक लडकी की शादी के कुछ दिनो बाद जब लडकी घर मे कुछ पुरानी तस्वीरें देख रही थी तो उसे ये तस्वीर दिखाई दी–

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लडकी ने पूछा- ” ये कहां की तस्वीर है? ”

लडका- “तुम्हारे गांव के मेले की! ” 🙂

लडकी- ” ओह!! तो फ़िर मुझसे मिले क्यूं नही?? ”

लडका- “मुझे क्या पता तुम थी वहां ! ”

लडकी- ” हां थी ना! वहीं पर! ये देखो- ”

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🙂 🙂

आज दोनो की शादी को कई बरस बीत गये…….

और इन पन्क्तियों के साथ आज के लिये विदा…..

रूक जाओ, जरा ठहर जाओ!
आशा के पल मे जीने दो!

काले बादल छंट जायेंगे,
इक ताजा नया गगन होगा!
सूरज की किरणो‍ के संग संग,
ये बोझिल तम भी कम होगा!
फ़िर खुशियो‍ के दिन आयेंगे!
मौसम को जरा बदलने दो!!

रूक—

इक दिन वो दिन भी आयेगा,
जब अपना गम कुछ कम होगा!
इक दिन वो दिन भी आयेगा,
जब ये संघर्ष खतम होगा!
फ़िर खुशियों के दिन आयेंगे,
थोडा सा वक्त गुजरने दो!!!

रूक—

Published in: on दिसम्बर 6, 2008 at 1:59 अपराह्न  Comments (15)  

कितनी और परिक्षा लोगे?? ?

(सात दिन सात पोस्ट -२)

कल की बात जहां खत्म की थी वही‍ से शुरु करती हूं, यानि भारतीय पुरुष प्रधान समाज मे स्त्रियो‍ की स्थिती की कुछ बातें करनी है‍-

कुछ दिनो पहले ई स्वामी की तीखे अन्दाज वाली एक पोस्ट ” तुम्हारा प्यार, प्यार और हमारा प्यार लफ़डा ? “ पढी थी.उसमे उन्होने एक लडकी के प्यार को  परिवार और समाज किस निगाह से देखता है, इसका जिक्र किया है.
लडकी के प्यार का ’लफ़डा’ अगर शादी मे परिणित  हो जाता है तब भी उसकी मुसीबते कम नही होतीं.‍
यहां तक कि उसका खुद का पति भी उसे शक की नजर से देखता है.. इस सम्बन्ध मे समाज मे नजदीक से देखी दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगी-

लडके और लडकी ने अपने दोनो के घर वालो की मर्जी के खिलाफ़ शादी कर ली और अलग घर मे रहने लगे…. पति जब अपने काम पर जाता तो पत्नी को अन्दर बन्द कर बाहर से ताला लगा कर जाता और आने पर ही खोलता.. उसे कहीं जाने आने की तो दूर, पास पडोस मे किसी से बात तक करने की इजाजत नही थी….. लडकी के सामने सिर्फ़ पति के जुल्म सहने के अलावा कोई चारा नही था… अगर बगावत करती भी तो समाज उसे चै्न से जीने नही देता…

एक डॊक्टर लडकी ने अपने घर वालो‍ के खिलाफ़ एक डॊक्टर लडके से शादी की… वो  बहुत धनाढ्य परिवार से थी अत: उसके पिता मध्यम वर्गीय परिवार मे उसकी शादी नही चाहते थे, हालांकि लडके का परिवार राजी था…  मर्जी के खिलाफ़ शादी करने पर पिता ने अपने घर मे लडकी से जुडी हर चीज को जला कर मिटा डाला और वर्षो बाद अब जबकी उसका एक बच्चा भी है आज तक पिता ने उससे बात नही की ,न ही कोई सम्बन्ध रखे….. डॊक्टर पति महोदय भी अपनी पत्नी को चौबीसो‍ घन्टे अपनी निगरानी मे रखते हैं, उसे भी किसी से  बात करने की इजाजत नही है, यहां तक कि जब वो ब्यूटीपार्लर मे अन्दर जाती है पति बाहर खडे रहकर उसका इन्तजार करते हैं!

कहना आसान है कि ये लडकियां बगावत क्यो‍ नही करती ….दरअसल सच ये है कि इस हालात मे इनके लिये दोनो ही तरफ़ संघर्ष होता है और ज्यादातर लडकियां समाज के बजाय अपने परिवार से और अपने आप से संघर्ष करते हुए जीती है‍…

** दोनो परिवारो की सहमति से शादियों मे भी कई जगह देखने को मिल जाता है कि पति पत्नी पर अपना रौब जमाते है‍…

प्रतिभा बेहद खूबसूरत ( पति उसके आगे कहीं नही ठहरते! 🙂 ) है और अपने पति के बराबर ही पढी लिखी भी,,लेकिन हर छोटे बडे फ़ैसले पति ही लेते है‍, जैसे प्रतिभा अमुक उम्र से बडे बच्चो‍ को घर मे नही पढायेगी, इस पुरुष से बात करेगी, उससे नही… कितनी देर क्या बात करेगी..आदि आदि..

प्रतिभा जैसी ही अनेक भारतीय भारतीय महिलाओं की ओर से ये बात दकियानूसी पतियो‍ कि लिये–

कितनी और परिक्षा लोगे?


कितनी और समीक्षा होगी?
कितनी और परिक्षा लोगे?
सदियों से तुम पति बने हो,
कब तुम मेरे मित्र बनोगे?

आगे आगे तुम चलते हो,
आंखें मूंद मै चलती पीछे,
कदम से मेरे कदम मिलाकर,
कब तुम मेरे संग चलोगे?

कितनी और समीक्षा होगी?
कितनी और…..

शब्दों को तुम समझ न पाते,
मौन के भी तुम अर्थ लगाते,
मेरे मन की बात समझने,
कब मेरी भाषा समझोगे?

कितनी और समीक्षा होगी?
कितनी और….

मेरा भी अपना एक मन है,
देह के बाहर भी जीवन है!
अपनी कैद मे रखकर मुझको,
कितना/ और कब तक परखोगे?

कितनी और समीक्षा होगी?
कितनी और्…..

—————-
**** अफ़लातून जी की टिप्पणी मै जनहित मे यहां लिखना चाहती हूं क्यों कि उनकी बात से मै भी सहमत हूं कि “इन उदाहरणों को पढ़कर प्रेम विवाह को खारिज न करें” … हमारे आस पास तमाम उदाहरण ऐसे भी हैं जहां प्रेम विवाह सफ़ल रहे हैं ….

कल फ़िर मुलाकात होगी 🙂
Published in: on दिसम्बर 4, 2008 at 12:38 पूर्वाह्न  Comments (16)  

सात दिन सात पोस्ट!!

हमारे आस पास जो चल रहा हो उसका असर हम पर भी होता ही है..पिछले दिनो मैने जम कर टेलीविजन देखा–  इतने चैनल, इतनी घटनाएं, इतने रिपोर्टर, उतने घन्टे… इत्यादी.

इसी सब से प्रभावित हो मैने भी एक प्रोग्राम बना लिया सात दिन मे सात पोस्ट लिखने का! 🙂 आज की पोस्ट है-

प्रतिक्रियाएं–
पिछ्ले दिनो मुम्बई मे हुई घटना पर सभी लोगो‍ ने अपने अपने हिसाब से ( और गलत नही होगा यदि कहूं कि अपनी अपनी हैसियत से भी! ) प्रतिक्रियाएं दी..

* एक सांसद महोदय जो कि ताज होटल मे फ़ंसे थे, अगले दिन बाहर आ पाये, कह रहे थे-

We are on a study  tour (!!!!!!!)… were taking dinner…..suddenly all this started… I rushed to my room and locked from inside..No fear at all! in fact i  enjoyed there!!!….. then some one called me that so and so will come to you to pick you up and ..i came out..

जाहिर है उनमे कही भी मारे गये लोगो के प्रति संवेदना का भाव नही था… जाने कैसे मीडिया ने इन्हे बक्श दिया और इनकी लापरवाही भरी प्रतिक्रिया सिर्फ़ एक या दो बार दिखाई…

* एक नन्ही बच्ची ( शायद ८- १० वर्ष की होगी)  भी घटना स्थल पर आई और समझदारी भरी बाते‍ कर रही थी….

* एक अन्य ११ वर्षीय बच्ची सविता कभी कभी अपनी नानी के साथ मेरे घर आती है..कल जब वो आयी तो मैने उससे मुम्बई की घटना के सिलसिले मे कुछ  बाते पूछी…. उसे कुछ भी नही पता था— उसने ये सब कभी नही सुना था- मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री, कमान्डो…यहां तक कि उसने ताज महल का नाम भी नही सुना…. जबकी वो स्कूल जाती है और चौथी क मे पढती है…..उसकी मां को भी ये सब नही मालूम… वो दोनो दुनिया के बारे मे ज्यादा नही जानती लेकिन दुनिया उन्हे जानती है….. दुनिया भारत की अन्य विशेषताओ‍ के साथ ही एक आंकडे के रूप मे इन्हे जानती है….

* एक प्रतिक्रिया कचरे के डिब्बे मे फ़े‍की गयी नवजात बालिका की भी है …

सोच रही थी.. क्या दुनिया मे कही भी स्त्री जाति से  कोई इतना विध्व‍ंसक हुआ है ? मै कैसे अवांछित हो जाती हूं? और ये नही होते? अगली बार ठीक से सम्भले ना जाये तो जन्मते ही इन्हे कचरे मे फ़ेंक देना……………
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आज के लिये इतना ही..  अब ब्रेक लेती हूं …..इस ब्लॊग के साथ बने रहीये तो नही कहूंगी 🙂 लेकिन कल को फ़िर से आइयेगा जरूर!!

Published in: on दिसम्बर 2, 2008 at 9:57 अपराह्न  Comments (12)