इतना गुस्सा??


इस तरह की बात अब हर दिन सुनाई देती है.. दुख होता है, लेकिन दुख होने की भी एक आदत सी पड जाती है… लेकिन घटना जब अपने आस पास की ही हो तो दुख होने के साथ साथ बेचैनी भी होती है…
समाज मे धैर्य और सहनशीलता की जगह अब जोश, जूनून और उग्रता लेती जा रही है..
बात कल ही की है.. नजदीक के एक स्कूल मे क्लास मे बेन्च पर बैठने की जगह को लेकर ९वी कक्षा के दो छात्रो‍ मे कहासुनी हुई.. फ़िर मारपीट… एक बच्चे ने दूसरे को इतनी बुरी तरह पीट डाला कि उसकी मत्यु हो गई… बच्चे ने शायद जान लेने के लिये न भी मारा हो लेकिन जाहिर है इतनी बुरी तरह पीटते हुए उसे डर भी नही लगा!
.. और भी दुखद ये है कि जिस बच्चे ने पिटाई की थी, उसके पिता ( जो कि किसी बीमारी के चलते अस्पताल मे भर्ती थे), ने अपने बच्चे से हुए अपराध की बात सुनकर सदमे से दम तोड दिया…
….. ये बात उस स्कूल की है जहां के बच्चों के माता पिता अनपढ नही होंगे.,.
समझ नही आता कल को ये बच्चे बडे होकर कैसा समाज बनाएंगे….

Published in: on फ़रवरी 28, 2009 at 11:20 अपराह्न  Comments (7)  

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7 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. बहुत ही गम्भीर प्रश्न उठाया है, आजकल बहुत छोटी-छॊटी बातो पर बच्चे हिन्सक हो उठते है —१० साल हो गये है बच्चो के बीच काम करते हुए, कई किस्से है,दो उदाहरण देना चहती हू ———
    १. स्कूल बस मे खिडकी को खोलने व बन्द रखने के विवाद मे एक ४थी क्लास का बच्चा, ७ वी क्लास के बच्चे के बारे मे कहता है –“भले वो ठंड से मरे तो मर जाये हम तो खिडकी खोल के बैठेंगे । ”
    २. छुट्टी के समय ,वापसी मे घर से थोडी दूर ही उतारने के पहले कन्ड्क्टर ने बच्चे से पूछा यहाँ से चले जाओगे? बच्चा– हम तो चले जाऎंगे ,मगर हमारे पापा तुम्हारे उपर “केस” कर देगें।(अब भला ४थी क्लास के बच्चे को “केस “का क्या मतलब मालूम होगा।)

  2. दुखद ! ये परिवार और समाज जैसी संस्थाओं की कमज़ोरी का ही फल है जो बच्चों में सहनशीलता जैसे गुण पनप नहीं पा रहे हैं।

  3. यह घटना न सिर्फ दुखद है, अपितु भयावह भी। जिस बालक ने पीटा व जिन साथी बालकों ने इस घटना को देखा, उनके बालमन पर जो भी छवि बनी होगी वह क्रूरता, असहनशीलता की किस सीमा का प्रतिनिधित्व करती होगी, उसकी परिणति भविष्य में किस रूप में होगी? यह शोचनीय है और हम उत्तरदायी अभिभावकों के सबक लेने को इंगित करती है। क्या कहीं इसके लिये हम स्वयं ही उत्तरदायी नहीँ है? हम ही कहाँ बालकों को सत्यता के साथ सहनशीलता को आग्रह स्वरूप अपनाने को प्रेरित करते है? सहनशीलता को तो अब शायद अब डरपोक होने का पर्याय माना जाता है।

  4. Rachana Ji , I also read about this , in News paper . And I am really disturbed , to read this . I have only three questions on this ,
    who is responsible for this & can we imporve the situation ? and how ?
    I think we all , this society is responsible for this , that we are not able to create values in this minds of this generation of tomorrow .
    I do not understand can this situation be improved ? and how ?
    If we fail to perform our duties , i do not think that this generation will ever forgive us …..

  5. दुखद है। समाज में संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। दो दिन पहले हाईस्कूल के एक छात्र ने अपने अध्यापक को सिर्फ़ इस बात के लिये गोली मार दी क्योंकि उसने उसको स्कूल ड्रेस में न आने पर फ़टकारा और उसको प्रवेशपत्र मिलने में देरी हुई।

  6. बेहद दुखद ।
    आजकल किसी की जान लेने मे लोग जरा भी संकोच नही करते है । बच्चे हो या बड़े ।
    पता नही परिणाम के बारे मे नही सोचते है ।

  7. आप सभी की टिप्पणियो‍ के लिये धन्यवाद..
    परिवार, समाज, व्यवस्था सभी का समान रूप से दोष लगता है..


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