इन्सान के अन्दर……

……. कभी कभी ऐसा होता है कि किसी इन्सान को हम धीरे धीरे, परत दर परत पह्चानने लगते हैं तब कई बातें पता लगती हैं, जो हमे चौकाती हैं और उस इन्सान से हुई पहली मुलाकातों से बनी छवि से कुछ अलग होती है…… यानि कई बार बाहरी इन्सान के अन्दर उससे कुछ अलग सा एक और इन्सान होता है…… यानि कभी अपनी नरम छवि से कहीं अधिक कठोर और कभी अपनी कठोर छवि से कहीं अधिक नरम!

” दुनिया मे अपनी पह्चान से अलग,
इन्सान के अन्दर एक और इन्सान होता है!

सामाजिक व्यवहार के अपने कानून कायदे होते हैं,
इसलिये अपनी छवि के साथ असली “मै” को ढोता है!

सबसे अलग चलना आसान नही होता,
इसलिये भीड मे शामिल हो वो ” मै” को खोता है!

दिन की छवि को अपने सिरहाने रख,
रात को अपने “मै” के साथ सोता है!

दुनिया उसे हर समय खुश देखती हो मगर,
अपने अकेले क्षणों मे वो भी कभी रोता है!

दुनिया मे अपनी पह्चान से अलग,
हर इन्सान के अन्दर एक और इन्सान होता है!
——————–

Published in: on मार्च 22, 2009 at 8:41 पूर्वाह्न  Comments (12)  

चतुर पंन्क्तियां.. :)

आज मैने एक पत्रिका मे “CLERIHEW ” के बारे मे पढा.. एक ब्रिटिश लेखक श्री Edmund Clerihew Benley (१८७५- १९५६) , इसके जनक माने जाते हैं..
ये चार पन्क्तियों वाली, मौज के लिये लिखी, छोटी कविता होती है.. इसे लिखने के कुछ नियम इस तरह हैं–

१. उनका तुकबन्दी का तरीका “aabb ” होना चाहिये यानि पहली दो और अन्तिम दो पन्क्तियों की तुकबन्दी होनी चाहिये ..

२. ये किसी चर्चित, मशहूर हस्ती के बारे मे हो्ना चाहिये, जिनका नाम पहली पन्क्ति मे लिया जाये..

३. इसे “मीटर” मे होना ही चाहिये ऐसा जरूरी नही..

ये नियम अन्ग्रेजी भाषा के लिये होंगे, लेकिन मैने हिन्दी मे कोशिश की है–

** इसका शीर्षक मैने चतु:+ पन्क्तियां = चतुर्पन्क्तियां ( यानि चार पन्क्तियां ) इस तरह से दिया है .
**नही जानती मै कि इस तरह की सन्धि जो चतु: + भुज = चतुर्भुज की तर्ज पर की है, सही है या गलत
ब्लॊगीय फ़्रीडम** के तहत मैने ऐसा किया है! 🙂

थोडे मजे के लिये उसे “चतुर पन्क्तियां” कह दिया…

१. सुना है “बहन जी” इस बार पी एम बनेंगी!
पता नही फ़िर देश को किस तरफ़ ढकेलेंगी!
अपने मत का उपयोग कर बुद्धिजीवियों को कुछ करना होगा,
वरना ्भविष्य मे जातिगत राजनीति की नीतियों से मरना होगा!

२.हमारे प्रधा्नमन्त्री, डॊ. मनमोहन सिंह जिनका नाम है!
राजनीती को छोड बाकी सब जिनका काम है!
इनकी “अर्थ शास्त्रीयता” ने देश को मन्दी मे भी सम्भाला है,
इनकी मित भाषिता ने वाचाल विपक्ष को भी पछाड डाला है!

३. ये हैं ऒस्कर विजेता भारतीय-” रहमान”
लोग मानते हैं इन्हे संगीतज्ञ महान!
कोई होता तो ऒस्कर के बाद हर चैनल, अखबार पर छा जाता,
लेकिन इन्हे बस काम से लगाव है, दिखावा रास नही आता!

४. एक हैं सबके चहेते- आमिर खान,
लोग इन्हे कहें बालीवुड की शान!
कभी ये “गजनी” बन “एट पैक्स” लहराते हैं
और कभी कभी तारों को जमीन पर ले आते हैं!

५. ये हैं हमारे अपने श्री समीर लाल!
सबके चहेते ब्लॊगर, उदासी के काल!
हास्य व्यंग लेखन से मुस्कान फ़ैलाना इनके बांये हाथ का खेल है!
और टिप्पणियां ( * लेना-देना ) तो जैसे इनके हाथों की मैल है! 🙂

६. ये हैं फ़ुरसतीया जी– लम्बी पोस्ट के महारथी,
या कहूं इन्हे, हिन्दी ब्लॊगजगत के सारथी!
छोटे या बडे, हर मुद्दे पर बतियाते हैं!
शब्द जाल मे उलझा कर सबकी मौज उडाते है!

——
*** क्या आप इसमे कुछ जोडना चाहेंगे ?

पुन:श्च—
** अभी मैने इसमे अजित जी को भी शामिल किया है 🙂

ये हैं ’शब्द सारथी’ श्री अजित वडनेरकर,
जो हमे करवाते हैं शब्दों का सफ़र!
शब्द की ऐसी बाल की खाल निकालते हैं,
कि हम शब्द को नख से शिख तक पहचान जाते हैं! 🙂

**** और रवि जी और मैथिली जी भी :)-

आप “रवि रतलामी” का नाम वहां जरूर पाईयेगा,
अगर आप हिन्दी ब्लॊग जगत ्के इतिहास मे जाईयेगा!
वाद- विवाद न इनको भाए,
गुप चुप काम ये करते जायें!

ये हैं- “ब्लॊगवाणी” वाले मैथिली जी हमारे!
जहां ब्लॊग शामिल हैं सारे, मेरे और तुम्हारे 🙂
हिन्दी लेखन से जुडी बात हम कैसे जायें भूल!
इन्ही की तो देन है हमको ” कैफ़ेहिन्दी टूल“!

ये हैं धूम धूम ” धोनी” , भारतीय कप्तान!
लोग इन्हे कहने लगे अभी से महान!
लेकिन कपिल देव की जगह ये तभी ले पायेंगे,
जब भारत को एक विश्व कप (५०-५० 🙂 ) दिलायेंगे!

और टिप्पणी मे मिली ’चतुर पन्क्तियां’ —-

और इनसे मिलो ये हमारे ““मनीष कुमार””,
गानों की इनके ब्लोग पर भरमार !
संगीत-माला की पायदान पर गाने दर गाने चढाते हैं,
और हर गाने के साथ हमारी जानकारी बढाते है !!

“उन्मुक्त जी” ” तो हाजिर रहते है हर समय,
उनको क्यों छोड दिया तुमने,क्या लगता है भय !
डरो मत मुन्ने के बापू कुछ नही पूछेंगे ,
और पूछेंगे तो हम दोनो मिल कर बूझेंगे !!

जाने कहाँ अंतरजाल में फ़ँस गया तुम्हार ” मुन्ना भाई “,
जिसकी ब्लोगिंग की शुरूआत कुछ दिन पुर्व ही मैने करवाई !
कंप्यूटर या नेट पता नही क्या खराब है उसका ,
अभी डायरी में लिखना पडता है,उसको लग गया है चस्का !!

तीसरा खंभा के द्विवेदी जी को कौन नही जानता!
हर कोई समस्या लिखकर जिनसे उचित राय मांगता!
जितनी हो सके, सबकी मदद करते हैं,
अपने हक के लिये लडने का हौसला ये लोगों मे भरते हैं!

अब है बारी ताऊ रामपुरिया जी की,
पता नही क्यों पसन्द नहीं इन्हें नजदीकी
इन्हे हर कोई नही ढूँढ पाते हैं
क्योंकि ये किसी भी ब्लोगर को अपना पता नही बताते हैं
– अर्चना

hai na ek pari ranju ji gulab si
ishq mein dubi,lage kisi khwab si
amruta ki khusbu bikharti hai mann mein
rachi hai shabdon ki jadugari inki kan kan mein.

– महक

अर्चना जी
,
नहीं मालुम, क्यों लोग मुझसे खाते भय,
मैं तो लोगों में भरता अभय।
नहीं मुझे किसी से शिकवा या सवाल,
लोग ही मुझे करते हैं हलाल।

– उन्मुक्त

“रचना जी” के लेखन में अद्भुत सी इक धार है
हमें सिखा दी ऐसी कविता जिसमें पंक्ति चार है,
इसी तरह से रहे सीखते, अगर तुम्हारी पाती से,
रोशन नाम हमारा होगा, ज्ञान की जलती बाती से.

– समीर लाल

दिल की बातें लिखनेवाले हैं डॉक्टर अनुराग
सबके दिल तक जाती है उनकी ही आवाज़
जो भी लिखते लगता जैसे सबकी बात वही है
जो भी पढ़ता कहकर जाता; “आपकी बात सही है.”

– शिव कुमार मिश्रा

** ये तो कमाल हो गया!! चतुर पंक्तियों के चक्कर मे आकर मेरे एक “अकवि मित्र” ने भी प्रयास किया और अभी अभी ये पन्क्तियां भेजी हैं —

हे देवकीनंदन
सुना तुम ही ने द्रौपदी क्रन्दन
जब द्यूत में कुंती पुत्रों ने बाजी थी हारी
और दाँव पर लगी थी निज कुल की ही नारी!!

Published in: on मार्च 16, 2009 at 5:37 अपराह्न  Comments (21)  

तर्क-वितर्क…

*** ये मेरे अपने दिमाग की उपज नही है बल्कि बहुत पहले किसी मित्र ने मेल को अग्रेषित करके भेजा था.. करीब दो साल पहले अपने दूसरे ब्लॊग पर मैने इसे पोस्ट किया था.. वहां हाल ही मे एक टिप्पणी मिली है.. तो मैने इसे दोबारा पढा और सोचा आपको भी मुस्कुराने का एक मौका दूं. 🙂
( मूल रूप मे ये ” lessons in logic” के रूप मे मुझे मिले थे ) कुछ मैने भी जोड दिये हैं इसमे.:)

१. अगर आपके पिताजी गरीब हैं तो ये आपका नसीब है लेकिन अगर आपके ससुर जी भी गरीब हैं तो ये आपकी मूर्खता है!

२. प्रेक्टिस आदमी को परफ़ेक्ट बनाती है,
लेकिन परफ़ेक्ट कोई भी नही होता,
तो फ़िर प्रेक्टिस की ही क्यों जाये??

३. अगर ये सच है कि हम इस दुनिया मे दूसरों की मदद करने के लिये आये हैं,
तो फ़िर दूसरे यहां किसलिये आये हैं ??

४. प्रकाश की चलने की गति, ध्वनि की चलने की गति से तेज होती है..
इसीलिये तो लोग आपको ्तबतक तेजोमय लगते हैं, जब तक कि आप उन्हे बोलते हुए सुन नही लेते!!

५. हर सफ़ल आदमी के पीछे एक महिला का हाथ होता है,
और हर असफ़ल आदमी के पीछे दो महिलाओं का!!

६. पैसा ही सब कुछ नही है,
“मास्टर कार्ड” और “वीसा” के भी कुछ मायने हैं!!

७. सुबह सोकर उठने से बेहतर कोई तरीका होना चाहिये नये दिन के शुरु होने का!

८. हर आदमी को शादी जरूर करनी चाहिये,
आखिर खुद की खुशियां ही सब कुछ नही है जीवन मे!!

९. आपका भविष्य आपके सपनो पर निर्भर करता है!
तो जाइये, जाकर सो जाइये!

१०. कठिन परिश्रम करने से आज तक कोई भी मरा नही है..
लेकिन करके देखकर रिस्क क्यूं लेने का बाबा! 🙂

११. काम मुझे मोह लेता है!
अत: मै काफ़ी देर तक उसे निहारता रहता हूं! 🙂

१२. हमारे रिश्तेदार भगवान बनाता है…
शुक्र है भगवान का कि उसने हमारे मित्र बनाना हम पर ही छोड रखा है! 🙂

१३. हम जितना ज्यादा सीखते हैं,
हम उतना ज्यादा जानते हैं,
हम जितना ज्यादा जानते हैं,
हम उतना ज्यादा भूलते हैं!
हम जितना ज्यादा भूलते हैं,
हम उतना ही कम जानते हैं,
ओह!!!!
तो हम सीखें ही क्यों?? 🙂

१४. भगवान सब जगह है,
वो सब कुछ सुन सकता है,
वो सब कुछ देख सकता है,
वो सब कुछ कर सकता है,
अरे!!
तो वो बैठे बैठे कर क्या रहा है!

१५. ” आपकी उम्र उतनी ही होती है, जितना कि आप सोचते हैं!
इस फ़्रेज का इस्तेमाल चालीस वर्ष के ऊपर के लोग ही इस्तेमाल करते हैं! 🙂

१६. पैसा सब कुछ नही होता”…
पूछिये उस पिता से जाकर! जिसने अभी अभी अपने बच्चे को खो दिया है क्यो कि उसके पास बच्चे के इलाज के लिये पैसे नही थे….

१७. “wise” कभी शादी नही करते,
और कर लेने पर वे “otherwise” बन जाते हैं!

१८. Success is a relative term.
It brings so many relatives!!

१९. Never put off the work till tomorrow
what you can put off today!!

२०. “abbreviation”!
भला ये इतना लम्बा शब्द कैसे हो सकता है 🙂

21. A bus station is where a bus stops.
A train station is where a train stops.
On my desk, I have a work station
what more can I say……..

22. “Reality bites!”
And Honesty beats!

Published in: on मार्च 14, 2009 at 4:07 अपराह्न  Comments (13)  

अभिनन्दन!!

बाधाओं को दूर भगा दो,
नई-नई अब राह बना दो,
कर लो तुम नारि अभिनन्दन!

नही रही मै ऐसी-वैसी,
नही परिक्षा सीता जैसी!
अब ना मुझको कोई बन्धन!
कर लो…

अब तक मै ना कुछ कह पाई,
कुछ कसमें थीं मैने खाई,
खत्म हुई अब सारी उलझन!
कर लो…

तन को मेरे राख किया है,
उम्मीदों को खाक किया है,
अब ना होगा कोई क्रन्दन!
कर लो…

सदियों मे हूं अब मै जीती,
अब मेरी स्वाधीन गति!
अब अपना है मेरा जीवन!
कर लो…

रावण को अब मरना होगा!
दु:शासन को हरना होगा!
ना होगा अब चीर-हरण!
कर लो…

पूजाएं सब कर डाली हैं,
माला सारी जप डाली हैं,
करना है अब नया हवन!
कर लो…

मीरा की भक्ति को जानो!
दूर्गा की शक्ति पहचानो!
मौका है! अब कर लो चिन्तन!
कर लो….

बच्चों को मैने ढाला है,
बडों को भी सम्भाला है,
काम किये हैं मैने पावन!
कर लो..

मां का तुमने मोल न जाना,
पत्नी को अबला ही माना!
अब समझो बेटी का गुन्जन!
कर लो…

राह मे मेरी नही आओगे,
अब मुझको ना भरमाओगे,
क्या तुम इतना कर पाओगे?
करना है अब तुमको मन्थन!
कर लो…

आओ अब प्रायश्तित कर लो!
तुम मेरे अब पीछे चल लो!
निर्मल कर लो अपना तन मन!
कर लो…

अब मुझको आगे बढना है!
बिल्कुल ना अब तो डरना है!
साथ है मेरे जग का हर कण!
कर लो…

हे भगवन! मत धोखा देना!
ए खुदा! सहारा देना!
सारे कर्म हैं तुमको अर्पण!!
कर लो..

………………

अब तक मेरे बगावती तेवरों से पुरुष वर्ग अगर नाराज है तो उनके लिये….. 🙂 पिछ्ली बार ऐसा हुआ था इसलिये .:)

बन्द करें अब हम ये झगडे,
ना मै छोटी, तुम न बडे!
चलो करें कुछ नया सॄजन!!
……………..
आज के इस खास मौके पर प्रत्यक्षा जी, मुन्ने की मां, घुघुति बासुति जी, रन्जना जी,ममता जी, लावण्या जी, संगीता जी, मानोशी जी, अर्चना दीदी,बेजी, डॊन, कन्चन, गरिमा, और सभी महिला ब्लॊगर साथियों को शुभकामनाएं…

और नॊन ब्लॊगर कम्म्युनिटी से, ” ग्रेट इन्डियन हाउस वाइव्स// होम मेकर ” कम्म्युनिटी से मां, उर्मिला भाभी, उर्वशी भाभी, प्रीती भाभी, साधना भाभी तथा पुष्पा दीदी, उषा दीदी, निशा दीदी, अल्पना दीदी को भी शुभकामनाएं…

Published in: on मार्च 8, 2009 at 2:41 अपराह्न  Comments (8)  

कोई भी काम छोटा या बडा नही होता..!

मैने जैसे ही कमरे के अन्दर कदम रखा, उसने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा-

“आ गयीं आप?”

मैने कहा- हां!

ये हमारी पहली मुलाकात थी लेकिन वो बहुत गर्मजोशी से मुझसे मिली.
वो परिचारिका( नर्स) की सहायक का काम करती है… कुछ लोग अपने साधारण से साधारण काम को भी बडे ही मन लगा कर करते हैं और माहौल को खुशनुमा बना कर रखते हैं..


वो मुझसे बातें करने लगी.. जल्दी ही मै उसके साथ सहज हो गयी-


“कहां रहती हैं आप?” , उसने पूछा.


मेरा जवाब सुनकर कहने लगी-


” अच्छा! वो जगह तो मुझे पता है.. हम लोग कुछ समय उस तरफ़ भी रहे थे.. मेरे आदमी ने उधर इस्त्री की दूकान खोली थी.. चली नही दीदी! तीन महीने रहे हम वहां ्लेकिन इतनी भी कमाई नही हुई कि एक महीने का दूकान का किराया निकल पाता…. मेरी कमाई से दूकान का किराया देना पडता.. क्या क्या करूं दीदी.. खाने का लाऊं या फ़िर बच्चों को पढाऊं… या उसकी दूकान का किराया दूं!”

“हां ये तो है.. अब क्या करते हैं वे?”

“कुछ नही.. कहता है काम नही मिल रहा कहीं भी…. इधर उधर घूमना, नही तो घर मे बैठे रहना…. उसको क्या है! अपने बच्चे हैं तो अपने को तो करना ही पडता है!…. मैने तो क्या क्या नही किया दीदी! .. मै १०वी तक पढी थी… बहुत परेशानी होने लगी तो मैने ये काम सीखने का सोचा.. एक साल के बहुत पैसे लगते हैं! कहां से लाती मै? मैने कुछ घरों मे बर्तन, कपडॆ धोने का काम ले लिया..क्या हुआ! कोई भी काम छोटा नही होता! …उससे पैसे जमा किये और फ़िर ये काम सीखा… अब थोडा ठीक हुआ तो आदमी के पास काम नही है.. सारा बोझ मुझ पर है.. खर्चा कितना लगता है! बच्चे स्कूल जाते हैं…”


” कितने बच्चे हैं तुम्हारे?”


” तीन! बडे वाले लडके को प्राइवेट स्कूल मे डाला है.. वहां बहुत पैसा लगता है!”
आज छोटी बेटी की तबियत ठीक नही है.. लेकिन काम पर तो आना ही पडता है..”


मैने नही पूछा कि इतनी परेशानी मे भी उसके तीन बच्चे क्यूं हैं!.. उसके पास जवाब होगा भी नही… अनेकों भारतीय महिलाओं की तरह शायद वह भी मानती होगी कि बच्चे तो भगवान की देन होते हैं! अब ये बात और है कि कई सारे “भगवान” नशे मे चूर होकर ये देन दे देते हैं और फ़िर बच्चों को पालने-पोसने की जिम्मेदारी उनकी मां और असल के भगवान के उपर छोड देते हैं…..



मुझे “स्लमडॊग” के “जय हो” की गूंज सुनाई दे रही है.. और मै इस “सुपर स्लमक्वीन” की जय कहना चाहती हूं…. वो भी हर पल अपने लिये उपजते सवालों के जवाब अपने आस-पास से ही तलाश लेती है और जिन्दगी को माकूल जवाब देती चलती है!


मैने सुपर स्लम इसलिये कहा कि वो जिस जगह रहती है वो तथाकथित ( दर्शित!) स्लम से जरा बेहतर है.. फ़िर “डॊग” शब्द अजीब सी कसमसाहट पैदा करता है! हमारे आसपास ही लोगॊं के ऐसा रहने की बजाए उन्हे ऐसा कहने मे ज्यादा बुरा लगता है! क्यो कि अव्वल तो हम उससे सामना( बाल ठाकरे वाला नही! 🙂 )करते नही, अगर हो भी जाये तो हमारे पास आंखें, नाक, मुंह सिकोड लेने की सुविधा होती है… लेकिन शब्द हमारे दिल-दिमाग पर अन्कित हो जाता है और हमे कचोटता है…


क्या ही अच्छा होता कि फ़िल्म का नाम भी स्लम- किंग, या फ़िर स्लम-प्रिंस, या फ़िर स्लम-ड्यूक या फ़िर स्लम-बॊय ही रख दिया जाता!!!

………………….

Published in: on मार्च 5, 2009 at 3:09 अपराह्न  Comments (8)  

जी भर के जी ले!!

जी भर के जी ले इसे तू अभी ही,
कभी ना पलट के ये पल आयेगा!

गम हो या खुशियां, ठहर कुछ न पाता,
एक दिन वक्त आने पे टल जायेगा!

थके मत, रूके मत! खोजता तू चला चल,
कभी तो तू प्रश्नों के हल पायेगा!

सोच मत! तुझसे ज्यादा क्यूं किसको मिला है,
ईर्ष्या की अग्नि मे जल जायेगा!

धरती ने कब किसको अपना बनाया?
यहां आज जो है, वो कल जायेगा!!

जन्मा था, सूरज के जैसे उगा था!
एक दिन मौत के साथ ढल जायेगा……

……….

रचना.

Published in: on मार्च 3, 2009 at 6:13 अपराह्न  Comments (13)