कोई भी काम छोटा या बडा नही होता..!

मैने जैसे ही कमरे के अन्दर कदम रखा, उसने मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा-

“आ गयीं आप?”

मैने कहा- हां!

ये हमारी पहली मुलाकात थी लेकिन वो बहुत गर्मजोशी से मुझसे मिली.
वो परिचारिका( नर्स) की सहायक का काम करती है… कुछ लोग अपने साधारण से साधारण काम को भी बडे ही मन लगा कर करते हैं और माहौल को खुशनुमा बना कर रखते हैं..


वो मुझसे बातें करने लगी.. जल्दी ही मै उसके साथ सहज हो गयी-


“कहां रहती हैं आप?” , उसने पूछा.


मेरा जवाब सुनकर कहने लगी-


” अच्छा! वो जगह तो मुझे पता है.. हम लोग कुछ समय उस तरफ़ भी रहे थे.. मेरे आदमी ने उधर इस्त्री की दूकान खोली थी.. चली नही दीदी! तीन महीने रहे हम वहां ्लेकिन इतनी भी कमाई नही हुई कि एक महीने का दूकान का किराया निकल पाता…. मेरी कमाई से दूकान का किराया देना पडता.. क्या क्या करूं दीदी.. खाने का लाऊं या फ़िर बच्चों को पढाऊं… या उसकी दूकान का किराया दूं!”

“हां ये तो है.. अब क्या करते हैं वे?”

“कुछ नही.. कहता है काम नही मिल रहा कहीं भी…. इधर उधर घूमना, नही तो घर मे बैठे रहना…. उसको क्या है! अपने बच्चे हैं तो अपने को तो करना ही पडता है!…. मैने तो क्या क्या नही किया दीदी! .. मै १०वी तक पढी थी… बहुत परेशानी होने लगी तो मैने ये काम सीखने का सोचा.. एक साल के बहुत पैसे लगते हैं! कहां से लाती मै? मैने कुछ घरों मे बर्तन, कपडॆ धोने का काम ले लिया..क्या हुआ! कोई भी काम छोटा नही होता! …उससे पैसे जमा किये और फ़िर ये काम सीखा… अब थोडा ठीक हुआ तो आदमी के पास काम नही है.. सारा बोझ मुझ पर है.. खर्चा कितना लगता है! बच्चे स्कूल जाते हैं…”


” कितने बच्चे हैं तुम्हारे?”


” तीन! बडे वाले लडके को प्राइवेट स्कूल मे डाला है.. वहां बहुत पैसा लगता है!”
आज छोटी बेटी की तबियत ठीक नही है.. लेकिन काम पर तो आना ही पडता है..”


मैने नही पूछा कि इतनी परेशानी मे भी उसके तीन बच्चे क्यूं हैं!.. उसके पास जवाब होगा भी नही… अनेकों भारतीय महिलाओं की तरह शायद वह भी मानती होगी कि बच्चे तो भगवान की देन होते हैं! अब ये बात और है कि कई सारे “भगवान” नशे मे चूर होकर ये देन दे देते हैं और फ़िर बच्चों को पालने-पोसने की जिम्मेदारी उनकी मां और असल के भगवान के उपर छोड देते हैं…..



मुझे “स्लमडॊग” के “जय हो” की गूंज सुनाई दे रही है.. और मै इस “सुपर स्लमक्वीन” की जय कहना चाहती हूं…. वो भी हर पल अपने लिये उपजते सवालों के जवाब अपने आस-पास से ही तलाश लेती है और जिन्दगी को माकूल जवाब देती चलती है!


मैने सुपर स्लम इसलिये कहा कि वो जिस जगह रहती है वो तथाकथित ( दर्शित!) स्लम से जरा बेहतर है.. फ़िर “डॊग” शब्द अजीब सी कसमसाहट पैदा करता है! हमारे आसपास ही लोगॊं के ऐसा रहने की बजाए उन्हे ऐसा कहने मे ज्यादा बुरा लगता है! क्यो कि अव्वल तो हम उससे सामना( बाल ठाकरे वाला नही!🙂 )करते नही, अगर हो भी जाये तो हमारे पास आंखें, नाक, मुंह सिकोड लेने की सुविधा होती है… लेकिन शब्द हमारे दिल-दिमाग पर अन्कित हो जाता है और हमे कचोटता है…


क्या ही अच्छा होता कि फ़िल्म का नाम भी स्लम- किंग, या फ़िर स्लम-प्रिंस, या फ़िर स्लम-ड्यूक या फ़िर स्लम-बॊय ही रख दिया जाता!!!

………………….

Published in: on मार्च 5, 2009 at 3:09 अपराह्न  Comments (8)  

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8 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. क्या ही अच्छा होता कि फ़िल्म का नाम भी स्लम- किंग, या फ़िर स्लम-प्रिंस, या फ़िर स्लम-ड्यूक या फ़िर स्लम-बॊय ही रख दिया जाता!!!
    हाँ मुझे भी यही लगता है।

  2. मैने तो इसका केवल पहला Scene देखा कुछ अच्छा नही लगा

  3. बिना स्लम-डॉग कहे वह विरोधाभास कहाँ से आता? गरीबी की वीभत्सता को कैसे दर्शाते? (मैंने नहीँ देखा है यह चलचित्र, यदि ऐसा नहीँ हुआ है तो इस पंक्ति को न माना जाय)। हम भी तो निकृष्टता साबित करने के लिये उसी पशु के नाम का प्रयोग कभी कभी अनायास अथवा सयास कर ही देते हैं। अपने यहाँ तो गाँधी जी ने पिछड़े वर्ग के सम्मान को न ठेस न पहुँचे उसके लिये अपमान सूचक शब्द हटा कर अपेक्षाकृत सम्मानसूचक शब्द प्रतिपादित किया। अब सम्मान को ठेस पहुँचा कर ही, निर्धनता का प्रदर्शन कर सनसनी व लोकप्रियता (ज्यूरीप्रियता से उपजी) पाना हो तो? शीर्षक चयन में भी क्योंकर कोताही की जाय, विशेषत: जब अन्यान्य काम उत्कृष्ट स्तर के हों।
    …चुम्बकीय शीर्षक की भी तो कोई महत्ता होती है !

  4. अच्छी पोस्ट लिखी है। जीवन की आपाधापी से जुड़ी संवेदनशील पोस्ट!

  5. यह सच है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता पर यह बात कम लोगों को समझ में आती है। लोग अक्सर अन्य का महत्व वह क्या काम करता है से निकालते हैं न कि इस बात से कि वह कैसा काम करता है।

    मेरे विचार से काम के तरीके, उसे करने का महत्व उस काम से कहीं बड़ा है। व्यक्ति का महत्व – उसके काम करने के तरीके, उसकी उत्तमता से लिया जाना न कि इससे कि वह क्या काम है। मेरे लिये एक अच्छा जूता पॉलिश करने वाला, किसी भी ऊंचे कामचोर या घूसखोर अफसर से बेहतर है।

    इसी लिये, मैं गुमनाम तरीके से चिट्ठकारी रहता हूं। मुझे लोग मेरी चिट्ठकारी से, विचारों से जाने न कि इस बात से कि मैं क्या काम करता हूं।

    कहीं ऐसा न हो कि लोगों को मेरी असलियत पता चलते ही वे मुझे भाव देना बिलकुल बन्द कर दें🙂

  6. abhi bhi kuchh nahi dikh raha mujhe…….. andaaz se type kar rahi hun

  7. sach kahaa..slumdog shabda mujhe bhi apattijanak lagaa tha…!

    ab padhane me aa raha hai

  8. ॒ शोभा जी, राजीव जी, अनूप जी टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया!

    ॒ मिश्रा जी, अपनी अपनी पसन्द है!🙂 कई दिनो बाद आपको यहां देखकर अच्छा लगा..टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया!

    ॒ उन्मुक्त जी! भगवान किसी से कोई ऐसा काम न कराए कि उसे अपनी असलियत बताने मे इतना डर लगे!🙂
    टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया!

    ॒ कन्चन, इतना बार आकर मेरी सहायता करने और टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया!


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