मेरी कविता मेरी आवाज! — 2

**  ( भाग 2 और भाग ३ )

..करीब ४ साल पहले नासिक आकाशवाणी से प्रसारित “विविधा” मे मेरा एक छॊटा सा कार्यक्रम प्रसारित हुआ था. जिसे मैने अपने रेडिओ सेट से टेप किया था.

कार्यक्रम मे आकाशवाणी की डॊ. अनुरुचा सिंह से बातचीत की साथ ही मैने अपनी कुछ रचनाएं पढी थी….. उसमे से बातचीत के कुछ अंश हटाकर रचनाएं आपके लिये प्रस्तुत हैं . .. समय समय पर आप इन्हे पढ तो चुके हैं अब सुनिये भी!!

** उन दिनो जो मुद्दे गर्म थे, मैने उन्ही पर बात की है.

भाग 2–  बेटीनयी सदी की दुल्हन , भारतीय नारि .

भाग ३ –  युवाओं के लिये , परिचय .

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Published in: on जुलाई 16, 2009 at 10:20 पूर्वाह्न  Comments (12)  

मेरी कविता मेरी आवाज!

..करीब ४ साल पहले नासिक आकाशवाणी से प्रसारित “विविधा” मे मेरा एक छॊटा सा कार्यक्रम प्रसारित हुआ था. जिसे मैने अपने रेडिओ सेट से टेप किया था.

कार्यक्रम मे आकाशवाणी की डॊ. अनुरुचा सिंह से बातचीत की साथ ही मैने अपनी कुछ रचनाएं पढी थी….. उसमे से बातचीत के कुछ अंश हटाकर रचनाएं आपके लिये प्रस्तुत हैं . .. समय समय पर आप इन्हे पढ तो चुके हैं अब सुनिये भी!!

भाग १– ( आतंकवादियों के नाम एक संदेश, स्वर्ग – नरक )

** उन दिनो जो मुद्दे गर्म थे, मैने उन्ही पर बात की है.

Published in: on जुलाई 14, 2009 at 11:14 अपराह्न  Comments (8)  

कविता जो नही बन पाई…..

कई शब्द हैं और कुछ भावनाएं,
सोचती हूं एक कविता बन जाये!

कुछ कठिन शब्द हैं, कुछ सरल,
कुछ वाक्य गड्डमगड्ड हैं तो कुछ विरल!

अक्षर सारे आ गये, स्वर भी सब यहीं हैं,
मात्राएं सब ये रहीं, चिन्ह भी यहीं कहीं हैं!

कहीं “अल्प विराम”  ( , ) मुंह छिपाये पडा है,
तो पास मे “पूर्ण विराम”  (
। ) खडा है!

“चन्द्र- बिन्दु”  ( ँ ) चिल्ला रहा- बताओ कहाँ लग जांउं?
’माँ ’ के साथ  लगाओगी? या चाँद’ पर चढ जाउं?

उधर देखती हूं, “बिन्दी”  ( . ) इठला रही,
“डैश” ( – ) भी कहीं लग जाने को बहला रही!

” अवतरण चिन्ह” ( ” ” ) कहे मुझे कहाँ लगाओगी?
“कोष्ठक”  (  ) भी पूछ रहा- मुझमे किसे बिठाओगी?

“प्रश्न वाचक” ( ? ) चिन्ह कहे- बताओ क्या पूछना है?
या कि तुम्हे बस ” विस्मय” ( ! ) मे ही रहना है!

सब कुछ है यहां, पर संयोजन नही हो पाता,
वाक्य रचना ठीक है, पर भाव कहीं खो जाता!

शब्द अलट- पलट किये मात्राएं लगाईं!
फ़िर भी एक अच्छी कविता नही बन पाई!!

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Published in: on जुलाई 11, 2009 at 5:11 अपराह्न  Comments (12)  

पोस्टकार्ड!!

अन्तर्जाल के इस युग मे डाकिया और डाक तो अब भी आती है, लेकिन पत्र नही आते.. लेकिन कुछ दिनों पहले मेरे नाम से एक पोस्टकार्ड आया! पत्र कई सौ मील दूर से आया था! लिखावट और भाषा से लगा कि किसी वृद्ध सज्जन ने लिखा है.पत्र मे मेरी लिखी दो रचनाओं की जमकर तारीफ़ की गयी थी.:) कुछ देर मै असमन्जस मे रही कि मेरी ये रचनायें इन्होने कहां पढ लीं! (  ब्लॊग पर ये रचनायें हैं, लेकिन जाहिर है ब्लॊग पर पढ कर कोई पत्र से प्रतिक्रिया नही देता! ) फ़िर मुझे याद आया कई दिनो पहले मुझे एक इ-मेल मिला था और मुझसे मेरे ब्लॊग पर लिखित दो रचनाएं किसी पत्रिका मे छापने के लिये अनुमति मांगी गयी थी… मेरा बायोडेटा भी मांगा गया था, लेकिन मैने कुछ उल्लेखनीय किया हो तो बताती.. मैने अनुमति दे दी और साथ मेरा नाम और ्पता ( प्रामाणिकता के लिये कि, हां! मै कोई हूं और कहीं रहती हूं 🙂 ) लिख देने को कहा.
..उसी पत्रिका मे मेरी रचनाएं इन सज्जन ने पढी थी और प्रतिक्रिया मे पत्र लिखा था.. वे मेरा फ़ोन नम्बर भी जानना चाह रहे थे.. अपना नम्बर उन्होने दे रखा था, सो सामान्य शिष्टाचार वश मैने उन्हे धन्यवाद कहने को फ़ोन किया…. वे बेहद खुश हो गये… पता चला उनकी उम्र ७६ वर्ष है और मेरी कविता “वृद्ध” उन्हे बेहद पसंद है… वे कई बार अपने हम उम्र मित्रों को सुना चुके हैं और उनके किसी मित्र को तो ये आप बीती लगी और उनके आंसू निकल गये… उन्होने मुझसे मेरी और भी रचनाएं मांगी.. मैने उन्हे अपने ब्लॊग का पता दिया तो वे नाराज हो गये, कहने लगे उन्हे ये आजकल का अन्तर्जालीय संवाद पसंद नही!! हालांकि उनके घर मे उनके बच्चे इसका इस्तेमाल करते हैं! उन्हे प्रिन्ट मे मेरी कविताएं चाहिये!
. मैने तो अपनी कवितायें या लेखन इतनी गम्भीरता से नही लिया.. बल्कि कई सारी कविताएं तो सिर्फ़ ब्लॊग पर ही हैं, अन्य कहीं लिख भी नही रखी मैने.. लेकिन अब लिखना होगा…
मुझे नही पता था कि मेरे शब्दो‍ की पहुंच इतनी होगी कि वे कभी इस उम्र के दिल को भी छू लेंगे…

Published in: on जुलाई 9, 2009 at 5:07 अपराह्न  Comments (7)  

घरकुल….

घरकुल, घर है कुछ खास लडकियों का…. शिल्पा, पिन्की, श्रुति, प्रिया, अदिति, रेणुका,लीना..आदि.

श्रीमती फ़डके के साथ हम इनके घर पहुंचे. वे सब हमे देख खुश हो गयीं.. सब ठीक से बैठी थी…कोइ ठीक से नही बैठी तो दूसरी ने  खींच कर उसे बैठाया…  . किसी की ओढनी फ़िसल जाने पर दूसरी तुरन्त उसे ठीक कर देती..
सबसे पहले उन सबने अपना नाम और अपने शहर का नाम बताया. फ़िर हमारे परिचय के बाद उन्होने बडे उत्साह से अपने काम के बारे मे हमे बताया. वे अगरबत्ती की पेकिंग,पापड बनाना, मसालों की पेकिंग करना, कपडे और कागज के सुन्दर फ़ूल बनाना आदि कई काम अपनी सहायिकाओं की मदद से करती हैं…
उनसे कुछ देर बातों के बाद वे हमसे घुल मिल गयीं और किसी ने गाना सुनाया तो किसी ने नाच कर दिखाया. हमे उनके हाथों से बनाये पापड और फ़ूल दिये..मेरी दीदी की बेटी के हाथ मे मेंहदी लगी थी, जो वे सब उत्सुकता से देख रही थी. उनसे मिलकर हमे अच्छा लगा और उन्हे भी, तो हमने तय किया कि हम अगले दिन दोपहर फ़िर आयेंगे,  साथ आइस्क्रीम खायेंगे और उनके हाथों मे मेंहदी लगायेंगे.
.. अगले दिन जब हम मेंहदी बनाने के लिये पहुंचे तो सब खाना खाकर अपना रोज का सोना त्याग कर एकदम तैयार थीं. हम सबमे से सबसे अच्छी मेंहदी लगाना दीदी की बेटी ( रानू) को आता है और सबसे कम अच्छी मुझे, फ़िर भी योगेश्वरी मुझसे बनवाने के लिये राजी हो गयी… प्रिया और कुछ अन्य लोगों को रानू से ही लगवानी थी. बाकी को दीदी ने और निशी ने बनाई. किसी को दोनो हाथों मे लगवानी थी तो किसी को एक हाथ पूरा भरकर! सब अपने मेंहदी वाले हाथ को सम्भाल रही थीं और देख देख खुश हो रही थीं..उनमे भी लडकियों मे होने वाली सजने संवरने की सहाजिक वृत्ति थी….फ़िर हमने साथ आइस्क्रीम खाई और बिदा लेने का वक्त आया… मेरी दीदी ने श्रुति को मेहंदी लगायी थी और वो पूरे समय लगातार मेरी दीदी का नाम याद करती रही, फ़िर जब हम जाने लगे तब उसने मेरी दीदी का हाथ पकड कर कहा ” अर्चना मला आवडली” ( अर्चना मुझे अच्छी लगी).
…. ये सभी मन्दबुद्धी लडकियां हैं, जिनमे बहुत कुछ समझ तो है ्बस जरा सी और समझ की कमी रह गयी है.. आम तौर पर दिमाग पूरी तरह से विकसित नही होने पर उसके साथ साथ कोई न कोई और विकलांगता होती है वैसी ही इनमे भी है. कोई बोलने-सुनने मे असमर्थ है तो कोई ठीक से देख नही पाती. समझ भी बेहद कमजोर है. कोई भी काम बहुत धीमे कर पाती हैं, लेकिन लगातार प्यार से सिखाने पर कर लेती हैं… फ़िर लडकियों के वयस्क होने पर सबसे बडी समस्या उनकी नियमित मासिक शारिरिक प्रक्रिया की होती है…
श्रीमती फ़डके और उनके सहयोगी बधाई के पात्र हैं जिन्होने वयस्क मन्दबुद्धी लडकियों के लिये इस “घरकुल” की स्थापना की है, जिसके लिये अथक परिश्रम के साथ ही समर्पण और संयम की आवश्यकता होती है. और आर्थिक सहायता से भी अधिक आवश्यकता होती है  समय देने की….. आज के इस “गुरु पूर्णिमा” के खास अवसर पर श्रीमती फ़डके को नमन!
अगली बार जब मै वहां जाउंगी तो मै नही जानती कि  प्रिया, शिल्पा आदि मुझे पहचान पायेंगी या नही लेकिन मै इन्हे कभी नही भूल पाउंगी…..

Published in: on जुलाई 7, 2009 at 4:55 अपराह्न  Comments (6)  

बेनामीयों के नाम…..

यहां और यहां से पता चला कि हिन्दी ब्लॊग जगत के नामी- गिरामी चिट्ठाकार इन दिनो बेनामीयों से हैरान परेशान हैं… उनके लिये मेरे पास ज्यादा तो कुछ कहने को है नही.. बस किसी की लिखी ये सुन्दर पन्क्तियां दोहराना चाहती हूं….

भला किसी का कर न सको तो बुरा किसी का मत करना,
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.

बन न सको भगवान अगर तुम, कम से कम इन्सान बनो,
नही कभी शैतान बनो तुम, नही कभी हैवान बनो.
सदाचार अपना न सको तो पापों मे पग ना धरना,
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.
भला किसी का……

सत्य वचन ना बोल सको तो झूठ कभी भी मत बोलो,
मौन रहो तो भी अच्छा है, कम से कम विष मत घोलो.
बोल यदि पहले तुम तोलो फ़िर मुंह को खोला करना.
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.
भला किसी का……

घर न किसी का बसा सको तो झोपडियां न ढहा देना,
मरहम पट्टी कर ना सको तो क्षार नमक न लगा देना.
दीपक बन कर जल ना सको तो अंधियारा भी मत करना,
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.
भला किसी का……
पुष्प नही बन सकते तो तुम कांटे बन कर मत रहना.
कांटे बन कर मत रहना.


लेखक- अज्ञात

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अगर आप इस गाने को सुनना चाहते हैं तो यहां सुन सकते हैं

Published in: on जुलाई 2, 2009 at 11:28 पूर्वाह्न  Comments (9)