एक परिचय….

आईये आपको आज मिलवाती हूं मेरी दीदी से.. . जिन्हे अन्तर्जाल की दुनिया मे आप एक ब्लॊगर के रूप मे ’अर्चना चावजी’ के नाम से जानते हैं, जो “मेरे मन की” नामक ब्लॊग मे अपने मन की लिखती हैं…. 🙂 ११ दिसंबर २००८ को उन्होने अपनी पहली पोस्ट लिखी और तब से अब तक २०६ पोस्ट लिख चुकी हैं! .. .. खूब जम कर लिख रही है.. दिल से लिख रही हैं.. गाने का उन्हे बेहद शौक है सो गाने भी सुने ही होंगे आपने! करीब ६० लोग जाहिर तौर पर उनके शुभ चिन्तक हैं और जिन्होने जाहिर नही किया है, ऐसे अनगिनत!

अब उनके बारे मे वे बातें जिन्हे आप नही जानते… मेरे माता पिता की शादी के करीब ८ वर्ष बाद मेरी दीदी का जन्म हुआ इसलिये वे बेहद लाडली रही…. वे मोहल्ले बल्कि गांव भर मे सबकी लाडली रही.. घर से कुछ ही दूर बाजार हुआ करता था, जहां से परिचित दुकानदार उन्हे हर दिन काजु , किशमिश इत्यादी बढिया बढिया खाने की चीजें देते. 🙂 ” झिगझाग ” नामक दुकान वाला दर्जी उनके लिये सुन्दर सुन्दर फ़्रॊक सिलता और चुन्नीलाल तांगे वाले के तांगे मे बैठ कर वे स्कूल जाती….. बाल मन्दिर से ही कहानी, कविता सुनाने की, नाच की प्रतियोगिताओं मे भाग लेती और जीतती भी!

जब वे बडी हुई तो उनका मन पढाई मे कम और खेल मे ज्यादा लगने लगा जिसके बारे मे उन्होने खुद लिखा है यहां… और मैने भी लिखा था एक बार —

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अब मिलिये मेरी चैम्पियन दीदी से!
ये भी ज्यादातर खेलों की माहिर खिलाडी हैं 🙂 एक बार स्कूल मे इनका अकेले का चयन, पहले संभाग स्तर पर और फिर राज्य स्तर पर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के लिये हो गया. बहुत दूर दूसरे शहर मे खेलने जाना था..लडकियों मे ये अकेली थीं अत: लडकों की टीम और उनके शिक्षक के साथ ही जाना था.. माँ को थोडी चिन्ता थी, लेकिन दादी ने भेज दिया…वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) की राज्यस्तरीय चैम्पियनशिप जीती…

अब भी से अपने स्कूल के बच्चों को उसी जोश से खिलवाती हैं..उनके बेटे-बेटी ने भी परम्परा बरकरार रखी है..बेटी राष्ट्रीय स्तर तक गोताखोरी कर चुकी है..

उनके खिलाडी होने और हारने-जीतने की हिम्मत उन्हे जिन्दगी मे भी काम आई जब एक दुर्घटना के बाद उनके पति साढे तीन साल तक कोमा मे रहे, तब अपने नन्हे बच्चों के साथ हौसले से आगे बढीं….
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अपनी विज्ञान की स्नातक की पढाई के बाद उन्होने कानून की स्नातक की पढाई की… उसकी कक्षा शाम की होती थी तो दोपहर को उन्होने सिलाई का डिप्लोमा हासिल कर लिया विशेष योग्यता के साथ! मेरे लिये उन्होने बहुत से सुन्दर कपडे सिले, और कढाई किये… उन्होने ढेरों स्वेटर बानाए… हमारे परिवार मे हर छोटे से लेकर बडे तक हर किसी ने उनका बनाया स्वेटर जरूर पहना है.. यहां तक कि कई रिश्तेदारों के बच्चों ने भी उनके बनाये स्वेटर पहने हैं!

हर तरह के दीवार पर लगाने वाले फ़्रेम उन्होने बनाये…

जब मै प्राथमिक स्कूल मे थी तब मेरी दीदी उच्चतर माध्यमिक स्कूल मे थी… उन दिनो हमारे घर मे राजदूत मोटर साइकिल (जिसे उन दिनो फ़ट्फ़टी कहा जाता था 🙂 ) थी .. मेरी दीदी वो चला लेती थी जो हमारे गांव मे अजूबा सा था .. मुझे वे कभी कभी स्कूल छोडने जाती तो मै गर्व से फ़ूली नही समाती 🙂 ….

उन दिनो हमारे घर मे गाय भैंस भी हुआ करती थी… मेरी दीदी भैंस का दूध निकालना भी जानती थी मेरे भाईयों की तरह ही वे भी एक बाल्टी भरकर दूध निकाल लेती थी…..

कुल मिलाकर यही कहूंगी कि ऐसा शायद ही कोई काम है जो मेरी दीदी ने नही किया हो या नही कर पाये…. अब भी हर नया काम सीखने को वो हमेशा उत्सुक रह्ती हैं…
मुझे जो थोडा बहुत काम आता है वो मैने उन्ही से सीखा है…

अपनी स्कूल मे वे सभी की बेहद चहेती शिक्षिका हैं… और घर मे भी सभी बच्चों की सबसे पसंदीदा बुआ या मौसी!

इन चित्रों मे हमारी मॊड्ल लडकियों ने जो क्रोशे से धागे से बने टॊप पहने हैं वो सब
दीदी ने ही बनाये हैं!

ये मेरी दीदी ने सिला है…

और ये भी उन्होने बनाया है. 🙂


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अन्त मे आज के इस खास दिन उनके लिये ईश्वर से एक यही प्रार्थना है कि उनकी बहुत परिक्षाएं हो चुकी अब और नही.. अब उन्हे आगे की जिन्दगी मे आपाधापी और संघर्ष नही बल्कि संतोष और सुकून मिले!!

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Published in: on अक्टूबर 25, 2010 at 12:50 पूर्वाह्न  Comments (12)