आजादियां…………….

* बाहर से आजाद दिखूं, पर,
अन्दर से हूं अब भी बन्द!
तुम कहते हो सुलझ गया सब,
पर बाकी है अब भी द्वन्द!!
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* वो, जो हर दिन अपनी आजादियों की सीमा लांघते हैं,
मुझसे मेरी आजादियों का हिसाब मांगते हैं!!
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* आजादियां भी बन्धनो को ढोती हैं,
उनकी भी अपनी सीमाएं होती हैं,
और तब उनके कोई मायने नही रह जाते,
जब वे अपनी जिम्मेदारियों को खोती हैं!
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* आजाद तो मै तब होउंगी,
जब अपनी सीमाएं खुद तय कर सकूं!
जब अपनी मन्जिलें खुद गढ सकूं!
जब अत्याचारों से खुद लड़ सकूं!!
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* उसे ऊंचाईयों से इतना दूर रखा गया कि,
वो चढना भूल गया!
दमन से वो इस तरह टूटा कि,
वो लड़ना भूल गया!
कैद से छोड़ने मे इतनी देर कर दी कि,
जब छोड़ा, वो उड़ना भूल गया!!
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* जो मिला अपना सा मुझको,
बात दिल की कह गई,
शब्द जो सब बन्द थे अन्दर,
खुल के बात बह गई !!
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Published in: on अप्रैल 12, 2011 at 4:27 अपराह्न  Comments (6)