रंग…….

……. मोहन ने अपने पडोसी हामिद पर केशरिया रंग डाला और हामिद ने मोहन पर हरा रंग डाला …
ये देखकर मोहन की अम्मा ने कहा – अच्छा है इन्होने एक दूसरे के रंग को स्वीकार कर लिया…….
हामिद की अम्मी बोली – हां! वरना ये दोनो लाल होते और हम काले! …..

Published in: on मार्च 25, 2011 at 6:12 अपराह्न  Comments (10)  

दोस्त और दोस्ती के लिये…

हां जी हां!! जानती हूं कि आज मित्रता दिवस नही है, लेकिन दोस्त और दोस्ती एक दिन के लिये तो नही होती ना! बल्कि हमेशा के लिये होती है तो आज कुछ पन्क्तियां दोस्त और दोस्ती के लिये…

” उलझन मे हूं, या दुख मे मै,
दोस्त है मेरा, फ़िक्र करेगा!

दूर है फ़िर भी भूलेगा ना,
कभी तो मेरा जिक्र करेगा! ”
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” दुनिया में कहीं भी होता हो मगर,
दोस्त का घर दूर कहाँ होता है!
जब भी चाहूँ आवाज लगा लेता हूँ,
वो मेरे दिल मे छुपा होता है!
जाने कैसे वो दर्द मेरा जान लेता है,
दुखों पे मेरे वो भी कहीं रोता है!”
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“यूं तो कहने को परिवार, रिश्तेदार साथ हैं, जिन्दगी बिताने को,
फ़िर भी एक दोस्त चाहिये, दिल की कहने- सुनने, बतियाने को!! ”
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” हर कोई ऐसा एक मित्र पाए,
जो बातें सुनते थके नही,
और मौन को भी जो पढ जाए!! ”
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” पुराने दोस्त और दोस्ती हमारे पुराने गांव की तरह होते हैं.. बरसों बाद जब हम फ़िर उनसे मिलते हैं तो कुछ बदल जाते हैं, लेकिन बहुत कुछ पहले की तरह ही होते हैं.. ”
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** और अब कुछ पन्क्तियां और, जो किसी मित्र से ही कही जा सकती है.:) किसी बात पर मैने अपने मित्र से कही थी….

” आत्म ज्ञान से इतना भी तृप्त मत हो जाइये कि और कुछ जानने कि ख्वाहिश ही न रहे,
गर्व से इतना भी मत बिगड़ जाईये कि सुधार की गुंजाइश ही न रहे!! ”

” ज्ञानी होने ( दिखने) के चक्कर मे जमाना tense बहुत है,
हम तो कहेंगे,
सबसे उपर रहने के लिये common sense बहुत है!! ”

” किसी की बात समझ न सको तो इतना न बौखलाइये!
बेहतर है आप अपनी समझ को समझाइये!! ”
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Published in: on जनवरी 12, 2011 at 10:12 अपराह्न  Comments (51)  

अब नये पैक मे!! :)

मित्रों, आज प्रस्तुत है मेरी दो पुरानी पोस्ट पॊडकास्ट रूप मे. यानि माल वही पुराना बस पैक नया है 🙂

*** ये खास कर मेरे पुराने ब्लॊगर मित्रों के लिये है, जो भूल गये हैं कि उन दिनों मैने कुछ अच्छी अच्छी पोस्ट लिखी थी …. वो मजे मजे के दिन थे.. 🙂

पहला पॊडकास्ट है “एक मुलाकात एक फ़ैसला
* पढने के लिये यहां देख सकते हैं – राम से मुलाकात , जिसे मैने २८ सित. २००७ को प्रकाशित किया था .


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दूसरा पॊडकास्ट है ” चुनाव
* पढने के लिये यहां देख सकते हैं – चुनाव जिसे मैने ९ जन. २००७ को प्रकाशित किया था .

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Published in: on जनवरी 5, 2011 at 10:37 अपराह्न  Comments (4)  

स्मृति-शेष……

मुझसे क्यूँकर तुम हुई बडी,
तारों मे जाकर हुई खडी,
मेरी बेटी तुम थी विशेष,
मेरी पूँजी ये स्मृति शेष….

रहती हो तुम वो कौन जहाँ?
कैसे ढूँढू मै तुम्हे, कहाँ?
चिन्ता होती है मुझे यहाँ,
है कौन तुम्हारे सँग वहाँ?
क्या इस जग से बेहतर वो देश?
मेरी पूँजी….

थी सौम्य, शान्त और अति गम्भीर,
आँखों मे डबडब भरा नीर!
थी तुम्हे सदा सादगी पसन्द,
नटने थटने का नही छन्द,
लम्बी चोटी, रेशमी केश!!
मेरी पूँजी…..

कपडों मे ज्यादा सूती पहना,
गहने का धातु बस सोना,
न ‘जन्क फूड’ न ‘फास्ट फूड’,
न चमक दमक, न शोर गुल,
साधा खाना, साधा परिवेश!!

“रो मत आ चल हम तुम खेलें,
मेरी टॉफी भी तू ले ले”
छोटी से ये सब कहे कौन?
है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
मेरी पूँजी….

मै लिखती, तुमको दिखलाती,
तुम मुँह बिचका कर यूँ कहती-
“ये पन्क्ति यहाँ पर ठीक नही,
हाँ!दूजी पन्क्ति है खूब कही!”
तुम होती थी पहली पाठक,
तुम होती मेरी सम्पादक!
तुमको न भा जाए जब तक,
तुम पास न करती मुझे तब तक!
अब लेखन है जैसे अवशेष..
मेरी पूँजी….

उस दिन दुकान मे जब देखा,
दुबला-पतला, नन्हा बच्चा,
सहमा सा था, कुछ सकुचाया,
था डरा हुआ, कुछ घबराया.
मजबूरी मे कर रहा काम,
बचपन उसका था यूँ तमाम,
देख उसे तुम दुखी हुई,
नन्हे दिल मे करुणा उपजी-
“माँ!इसको कुछ पैसे दे दो,
मेरा ये पेय इसे दे दो”
त्याग को तुम हरदम तत्पर,
जैसे हो कोई ” सन्त- मदर”!
वो घूँट गले मे ही अटके,
मोती जैसे आँसू टपके.
उस पल ही उस पेय को त्याग दिया,
जीवन भर फिर वो नही छुआ.
जब कर लेती तुम दृढ निश्चय,
फिर ना बदलोगी, ये था तय,
था प्रेम सदा, न कभी द्वेष!
मेरी पूँजी…..

है दुखद बहुत तुमको खोना,
इतनी जल्दी भी क्या जाना,
बातें करती, कुछ कहती तो,
कुछ देर को जरा ठहरती तो,

याद तुम्हारी जब आये
मन मेरा बेहद घबराये
इतना मुझे रुलाओ ना,
इतनी दूर को जाओ ना,
तुम बिन जीना मैं जानू ना,
वापिस आओ, आ जाओ ना।

तुम चली गई हो किस विदेश?
मेरी पूँजी….

तुम बिन, बोलो कैसे जीना?
कितने आँसू, कब तक पीना?
वक्त के साथ न कम होता,
ये दर्द और भी गहराता…
इस जीवन से अब हुआ विद्वेश..
मेरी पूँजी…….

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कबीर का एक भजन मेरी आवाज मे.. जिसे पूर्वी ने ही मुझे ठीक से गाना सिखाया था….

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एक धुन —


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Published in: on दिसम्बर 12, 2010 at 5:26 अपराह्न  Comments (11)  

एक परिचय….

आईये आपको आज मिलवाती हूं मेरी दीदी से.. . जिन्हे अन्तर्जाल की दुनिया मे आप एक ब्लॊगर के रूप मे ’अर्चना चावजी’ के नाम से जानते हैं, जो “मेरे मन की” नामक ब्लॊग मे अपने मन की लिखती हैं…. 🙂 ११ दिसंबर २००८ को उन्होने अपनी पहली पोस्ट लिखी और तब से अब तक २०६ पोस्ट लिख चुकी हैं! .. .. खूब जम कर लिख रही है.. दिल से लिख रही हैं.. गाने का उन्हे बेहद शौक है सो गाने भी सुने ही होंगे आपने! करीब ६० लोग जाहिर तौर पर उनके शुभ चिन्तक हैं और जिन्होने जाहिर नही किया है, ऐसे अनगिनत!

अब उनके बारे मे वे बातें जिन्हे आप नही जानते… मेरे माता पिता की शादी के करीब ८ वर्ष बाद मेरी दीदी का जन्म हुआ इसलिये वे बेहद लाडली रही…. वे मोहल्ले बल्कि गांव भर मे सबकी लाडली रही.. घर से कुछ ही दूर बाजार हुआ करता था, जहां से परिचित दुकानदार उन्हे हर दिन काजु , किशमिश इत्यादी बढिया बढिया खाने की चीजें देते. 🙂 ” झिगझाग ” नामक दुकान वाला दर्जी उनके लिये सुन्दर सुन्दर फ़्रॊक सिलता और चुन्नीलाल तांगे वाले के तांगे मे बैठ कर वे स्कूल जाती….. बाल मन्दिर से ही कहानी, कविता सुनाने की, नाच की प्रतियोगिताओं मे भाग लेती और जीतती भी!

जब वे बडी हुई तो उनका मन पढाई मे कम और खेल मे ज्यादा लगने लगा जिसके बारे मे उन्होने खुद लिखा है यहां… और मैने भी लिखा था एक बार —

***
अब मिलिये मेरी चैम्पियन दीदी से!
ये भी ज्यादातर खेलों की माहिर खिलाडी हैं 🙂 एक बार स्कूल मे इनका अकेले का चयन, पहले संभाग स्तर पर और फिर राज्य स्तर पर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के लिये हो गया. बहुत दूर दूसरे शहर मे खेलने जाना था..लडकियों मे ये अकेली थीं अत: लडकों की टीम और उनके शिक्षक के साथ ही जाना था.. माँ को थोडी चिन्ता थी, लेकिन दादी ने भेज दिया…वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) की राज्यस्तरीय चैम्पियनशिप जीती…

अब भी से अपने स्कूल के बच्चों को उसी जोश से खिलवाती हैं..उनके बेटे-बेटी ने भी परम्परा बरकरार रखी है..बेटी राष्ट्रीय स्तर तक गोताखोरी कर चुकी है..

उनके खिलाडी होने और हारने-जीतने की हिम्मत उन्हे जिन्दगी मे भी काम आई जब एक दुर्घटना के बाद उनके पति साढे तीन साल तक कोमा मे रहे, तब अपने नन्हे बच्चों के साथ हौसले से आगे बढीं….
******

अपनी विज्ञान की स्नातक की पढाई के बाद उन्होने कानून की स्नातक की पढाई की… उसकी कक्षा शाम की होती थी तो दोपहर को उन्होने सिलाई का डिप्लोमा हासिल कर लिया विशेष योग्यता के साथ! मेरे लिये उन्होने बहुत से सुन्दर कपडे सिले, और कढाई किये… उन्होने ढेरों स्वेटर बानाए… हमारे परिवार मे हर छोटे से लेकर बडे तक हर किसी ने उनका बनाया स्वेटर जरूर पहना है.. यहां तक कि कई रिश्तेदारों के बच्चों ने भी उनके बनाये स्वेटर पहने हैं!

हर तरह के दीवार पर लगाने वाले फ़्रेम उन्होने बनाये…

जब मै प्राथमिक स्कूल मे थी तब मेरी दीदी उच्चतर माध्यमिक स्कूल मे थी… उन दिनो हमारे घर मे राजदूत मोटर साइकिल (जिसे उन दिनो फ़ट्फ़टी कहा जाता था 🙂 ) थी .. मेरी दीदी वो चला लेती थी जो हमारे गांव मे अजूबा सा था .. मुझे वे कभी कभी स्कूल छोडने जाती तो मै गर्व से फ़ूली नही समाती 🙂 ….

उन दिनो हमारे घर मे गाय भैंस भी हुआ करती थी… मेरी दीदी भैंस का दूध निकालना भी जानती थी मेरे भाईयों की तरह ही वे भी एक बाल्टी भरकर दूध निकाल लेती थी…..

कुल मिलाकर यही कहूंगी कि ऐसा शायद ही कोई काम है जो मेरी दीदी ने नही किया हो या नही कर पाये…. अब भी हर नया काम सीखने को वो हमेशा उत्सुक रह्ती हैं…
मुझे जो थोडा बहुत काम आता है वो मैने उन्ही से सीखा है…

अपनी स्कूल मे वे सभी की बेहद चहेती शिक्षिका हैं… और घर मे भी सभी बच्चों की सबसे पसंदीदा बुआ या मौसी!

इन चित्रों मे हमारी मॊड्ल लडकियों ने जो क्रोशे से धागे से बने टॊप पहने हैं वो सब
दीदी ने ही बनाये हैं!

ये मेरी दीदी ने सिला है…

और ये भी उन्होने बनाया है. 🙂


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अन्त मे आज के इस खास दिन उनके लिये ईश्वर से एक यही प्रार्थना है कि उनकी बहुत परिक्षाएं हो चुकी अब और नही.. अब उन्हे आगे की जिन्दगी मे आपाधापी और संघर्ष नही बल्कि संतोष और सुकून मिले!!

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Published in: on अक्टूबर 25, 2010 at 12:50 पूर्वाह्न  Comments (12)  

रोटी -२

रोटी -२ इसलिये कि एक बार पहले भी मै रोटी की बात कर चुकी हूं…. आज फ़िर करना पड़ रही है……

बात वही पुरानी है,
गरीबों की कहानी है,
मुझे तो बस दोहरानी है..

इन दिनो दुनिया भर मे भारत के विकास की तूती बोलती है,
लेकिन देश के गरीबों की हालत हमारी पोल खोलती है….

विकास के लिये हमारे देश का मजदूर वर्ग अपना पसीना बहाता है,
लेकिन देश का विकास उसे छुए बगैर, दूर से निकल जाता है…

भारत आजादी के बाद हर क्षेत्र मे आगे बढ़ा है,
लेकिन उसका गरीब आदमी अब भी जहां का तहां खडा है….ं

हमारे देश मे अमीरी और गरीबी के हमेशा ही दो धड़ रहे हैं,
अमीर सरकार के गोदामों मे अनाज के कई सौ बोरे सड़ रहे हैं……

सरकारी नीतियां बहुत ही अनसुलझी हैं,
गरीब की रोटी उसकी नीतियों मे ही उलझी है…..

गांव के किसान गरीब नत्था को आमिर खान की ’पीपली लाइव” मे
सिर्फ़ एक्टिंग भर नही करना है,
बल्कि अपनी जान देकर उसे सचमुच मे मरना है………….
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Published in: on सितम्बर 21, 2010 at 1:32 अपराह्न  Comments (4)  

बिन्दी वाले अक्षर…….

एक मित्र ( वो ब्लॉग लिन्क के मोहताज नही हैं, इसलिये उनके ब्लॉग की लिन्क नही दे रही. 🙂 ) मिल गये ऑन लाइन तो उनसे मैने कुछ अक्षर सही तरह से लिखना सीखे जो मै नही लिख पाती थी…

क्या आप लिख पाते हैं ??
ज्ञ, ञ, ड़, न् ढ़ … अगर हां तो टिप्पणी मे लिख कर दिखाईये जरा! ( कॉपी पेस्ट मत करिये यहाँ से, की स्ट्रोक बताईये रोमन में लिख कर :))

हां एक बात और —ड और ड़ तथा ढ और ढ़ का सही प्रयोग कहां होता है ? (कृपया शब्द बतायें जैसे ह के लिए हवा, सेहर, ज के लिए जहाज, कागज आदि…)
कुछ शब्द ( कम से कम २/३ शब्द और हो सके तो वाक्य भी ) लिख कर बतायेंगे जरा ?

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Published in: on अगस्त 10, 2010 at 2:53 अपराह्न  Comments (9)  

स की शमश्या!!

सूचना– इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति ( या ब्लॊगर ! )को आहत या अपमानित करना नही है… सिर्फ़ इस समस्या ( या स्थिती ) के बारे मे बात करना है… फ़िर भी किसी को कष्ट हो तो क्षमा करें..

भारत मे कई भाषाएं और बोलियां बोली जाती है और हर क्षेत्र का अपना एक लहजा है… हिन्दी भी पचासों तरह से बोली जाती है…कई लोग “स” को “श” और “श” को “स” बोलते हैं.. लेकिन मेरे विचार मे ये समस्या या स्थिती बोलने के लहजे से सम्बन्धित नही है, बल्कि व्यक्ति विशेष की आदत बन जाती है… ऐसा किसी शारिरिक कमजोरी की वजह से नही होता, क्यों कि वो दोनो ही अक्षर ठीक से बोल लेते हैं बस उनकी जगह बदल कर बोलते हैं.. आश्चर्य तो तब होता है जब वे लिखते समय भी ऐसा करते हैं!

जब बच्चा बोलना सीखता है तभी ध्यान देने पर इस तरह की समस्या शायद न हो.. बोलना सीखते समय अक्षर और शब्दों के उच्चारण दिमाग की स्मृति मे अन्कित हो जाते हैं.. बडे होने पर वही शब्द उच्चारित होते हैं. इस बात का जिक्र मैने “ गुड्डी” की बारे मे लिखी पोस्ट मे भी किया था….

तुतला कर बोलने की भी ज्यादातर वजह यही होती है कि, जब बच्चे बोलना सीखते हुए कुछ अक्षर गलत उच्चारित करते हैं, तो घर के लोग बजाये उसे सुधारने के खुद भी वैसे ही बोलने लगते हैं!

घर के लोग अगर टोकें तो उच्च्चारण ठीक किये जा सकते हैं… जब बच्चा कहे – “मुझे भी दाना है”, तो उसे ले जाने के पहले कहा जाये… “दाना है” नही, बोलो – ’जाना है” “ज” “ज” ज” –जाना है!! 🙂 “तलो’ नही “च’ च” च’ — चलो!! 🙂

मेरी बचपन की मित्र थी (है) वो हकला कर बोलती है. अक्षर सारे सही उच्चारित करती है लेकिन कभी कभी किसी अक्षर को वो बोल ही नही पाती… उसकी मां ने हमसे उसे टोकते रहने को कहा था और हमने कुछ हद तक उसकी समस्या को कम किया. उसके मामले मे डॊक्टर ने कहा था कि उसकी शारिरिक तौर पर उच्चारण के लिये कोइ समस्या नही है लेकिन घर मे उसकी विकलांग मौसी ( जो अन्य विकलांगताओं के आलावा ठीक से बोल नही पाती, बेहद मुश्किल से कुछ शब्द बोल पाती है) की वजह से शायद उसे इस तरह बोलने की आदत हुइ है.. हालांकि ये भी उतना ही सच है कि घर मे मौसी के अलावा भी चार लोग थे जो स्पष्ट बोलते थे…

भाषा के साथ साथ ही उच्चारण भी सही और स्पष्ट हों तो भाषा और भी अच्छी लगती है.. तो हमे इस समस्या का व्यावहारिक और समाजिक निदान करने के प्रयास करने चाहिये…

Published in: on जुलाई 24, 2010 at 12:57 पूर्वाह्न  Comments (9)  

चंचल मन….

नमस्कार!!

पहचाना मुझे? भूल तो नही गये ना? 🙂

मै वही पुरानी, जो कभी कविताएं और कभी लेख लिख देती थी,
जो मेरे मन मे आये वो बातें क्ररती थी….
आज फ़िर हाजिर हूं, अपने मन के साथ…

** आजकल दिलीप बहुत अच्छी कविताएं लिख रहे हैं.. उन्होने ’मन’ को कुछ सलाह दी तो मेरे मन ने भी कुछ कहा. 🙂

मन है चंचल, मन अधीर है,
वो कभी न है ठहरता!
सांस के संग हमकदम हो,
वो अथक, अविराम चलता!

सपनों को ऊंचाई मिलती,
मन के घोडे दौडते जब,
दुख हटा, स्वच्छन्द मन से,
हम निराशा छोडते जब!!
यूं तो मन मे राम ही है,
पर कभी रावण आ बसता!
मन है चंचल, मन अधीर है,
वो कभी न है ठहरता!

तर्क हों दिमाग के जब,
और हों मन की भावनाएं!
किसको छोडें, किसकी सुन लें,
ऐसी दुविधा मे फ़ंस जाएं!
आगे कर दिमाग को तब ,
मन बेचारा पीछे हटता!
मन है चंचल, मन अधीर है,
वो कभी न है ठहरता!

काम अच्छे हम करें जो,
सब दिमाग के खाते जाएं,
और सब गलतियां हमारी,
भावुक मन के माथे आएं!
जिन्दगी के सुख मे, दुख मे,
केवल मन ही साथ रहता!
मन है चंचल, मन अधीर है,
वो कभी न है ठहरता!

कोइ लगते बैरी हमको,
कोइ लगते हमको प्यारे!
प्यार के या बैर के हों,
मन के हैं सम्बन्ध सारे!
मन मे जैसा बस गया जो,
मन से फ़िर वो न निकलता!
मन है चंचल, मन अधीर है,
वो कभी न है ठहरता!

जीत मिलती हमको मन से,
मन के हौंसले हैं न्यारे
हार हमसे दूर होगी!
जब तक मन से हम न हारे!
साथ चल, संघर्ष कर,
मुझसे मेरा मन ये कहता!
मन है चंचल, मन अधीर है,
वो कभी न है ठहरता!
सांस के संग हमकदम हो,
वो अथक, अविराम चलता!

रचना

Published in: on जून 12, 2010 at 5:18 अपराह्न  Comments (12)  

अभिवादन!

” नमस्ते!! कैसी हैं आप?  ” जैसे ही मैने हिन्दी की उन वृद्ध अध्यापिका से कहा, वे खुश हो गयीं और मुझे अपने पास ही जगह देकर बैठने को कहा… मुस्कुरा कर उन्होने नमस्ते कहा और कहने लगीं आजकल तो कोई कहता नही है नमस्ते , तुमने कहा तो अच्छा लगा!
.. कई और बच्चे अपने माता/ पिता के साथ आ रहे थे लेकिन मैने देखा ज्यादातर ने उन अध्यापिका को नजरन्दाज ही किया.. मैने अपनी बेटी से मजाक से कहा -कैसे बच्चे हैं तुम्हारी स्कूल के, कोई भी अपनी टीचर को नमस्ते नही कह रहा.. मेरी बेटी ने तुरन्त ही  मुस्कान के साथ कहा- लेकिन किसी के भी मम्मी या पापा ने उनसे कुछ नही कहा!!

समय के साथ अभिवादन के तौर तरीके भी बदल रहे हैं.. चरण स्पर्श का स्थान नमस्ते ने लिया अब नमस्ते का स्थान  “हेलो”  ले रहा है… बच्चों के कहने से पहले घर मे आये अन्कल या आन्टी ही उन्हे हेलो कह कर अभिवादन कर लेते है..जब हम बच्चे थे तो घर मे किसी भी मेहमान के आने पर उनका अभिवादन जरूरी होता.. अगर उन्हे  नजरन्दाज कर दिया जाता तो दादी और पिताजी की डांट पडती उन्ही के सामने और फ़िर पैर छूकर ही काम बनता!
.. बुजुर्ग लोग अब भी पुराने तौर तरीकों ्को ही पसन्द करते हैं.हाल ही मे मै एक मित्र के घर एक पारिवारिक समारोह मे शामिल होने गयी थी वहां उनके वृद्ध पिता से पहली बार मुलाकात हुई.. मैने नमस्ते कह उनका अभिवादन किया.. उन्होने कहा -अरे तुम तो नासिक से, पुण्य नगरी से आई हो! मुझे तुम्हारे पैर छूने चाहिये!! ” मुझे तुरन्त अपनी गलती का अह्सास हुआ और मैने पैर छूकर अपनी गलती सुधारी!

.. पुराने दिनो मे पूरा मोहल्ला ही एक परिवार की तरह हुआ करता था लेकिन अब तो आस – पडोस के भी मायने बदल गये हैं.. मोहल्ले मे अभिवादन भर की पहचान हो तो भी बहुत है! जरुरत पडने पर ही पहचान इससे आगे बढती है.. ऐसा ही कुछ पुराना एक किस्सा है- अपनी दोनो बेटियों को लेकर मै घर के पास ही एक बगीचे मे शाम को जाया करती थी.. वहीं पास ही की एक महिला अपनी नन्ही बेटी को लेकर आती थी.. रोज ही हम मिलते. मै उन्हे नमस्ते कहती लेकिन उन्हे अभिवादन भर की पह्चान मे भी कोई रुचि नही थी जबकि हमारे छोटे बच्चे ऐसे मिल जुल कर खेलते मानो उनकी बरसों पुरानी पह्चान हो! :). वे मेरी नमस्ते का जवाब अनमने ढंग से देतीं लेकिन मेरे अन्दर माता पिता के अति विनम्र जीन्स के चलते मैने कभी उन्हे “उंह….”  की तरह का भाव नही दर्शाया बल्कि हमेशा मेरी तरफ़ से यही रहा -” ठीक है! जैसी तुम्हारी मर्जी! “…. एक दिन जब मै वहां पहुंची तो उनके तेवर बिल्कुल ही बदले हुए थे.. उन्होने चहकते हुए नमस्ते कह कर मेरा स्वागत किया.. लगा जैसे वे मेरा इन्तजार कर रही थीं.. दुनिया भर की बातें की और अन्त मे जब उन्होने मुद्दे की बात की तभी मुझे उनके इस बदले स्वरूप का कारण ्समझ मे आया.. दरअसल उन्हे किसी सिलसिले मे मेरी मदद चाहिये थी और मेरी पडोसन ने उन्हे बताया था कि मै बहुत भली हूं और मै जरूर उनकी मदद कर दूंगी!
तो मित्रों हमे अपने आस पास के लोगों से अभिवादन भर की पह्चान जरूर रखनी चाहिये.. क्यों कि क्या पता कब किसकी कितनी जरूरत पड जाये! 🙂
नमस्कार! 🙂

Published in: on सितम्बर 16, 2009 at 11:31 अपराह्न  Comments (16)