असमन्जस..

सीधा-साधा रास्ता भी मुझको,
अब लगता चौराहा-सा,
जाने किस धुन मे भाग रहा,
है हर इन्सा बौराया-सा.

पैसा-पैसा करता रह्ता,
है वो अमीर इतराया-सा,
जैसे-तैसे जीवन जीता,
है वो गरीब सकुचाया-सा.

ज्ञानी होने का ढोँग करे,
वो पढा-लिखा इठलाया-सा,
अनपढ है जो, वो भी बस यूँही,
है पडा हुआ अलसाया-सा.

किस राह से मुझको लक्ष्य मिले,
सोचे युवा भरमाया-सा,
जीवन की इस भाग-दौड मे,
है बालक घबराया-सा.

विज्ञान से सब सुख पा लूँगा,
सोचे मानव ललचाया-सा.
इतना बदला मेरा मानव??
सोच ईश्वर पछताया-सा!!!!

Published in: on September 13, 2006 at 6:57 am Comments (10)

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10 Comments Leave a comment.

  1. बहुत खूब।

  2. सुंदर रचना है. नयी प्रविष्टी की जानकारी चिठ्ठा चर्चा के लिये ईमेल से भिजवा दिया करें, जब तक नारद की तबियत नासाज है:
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

  3. हिमान्शु भाई और समीर जी,बहुत धन्यवाद.

  4. बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने..
    मैं इसे औरों को पढाना चाहूंगा.. आपका ब्लोग लिंक कर रहा हूं..
    धन्यवाद..

    लिखते रहें.. :)

  5. गौरव जी, पसँदगी का बहुत शुक्रिया!!और आपके ब्लोग पर बहुत बढिया सँग्रह किया है आपने..लेकिन मुझे वहाँ मेरे ब्लोग की लिन्क कहीं नही दिखी?

  6. [...] ——————————-रचना बजाज.. [...]

  7. “Asamanjas”….was awesome…very meaningfully woven words

  8. Thanks to you..
    We always need something good to read and go in life..

    Keep writing.. :)

  9. सत्य,सँच.

  10. mere comp. par hindi fonts nahi he…sorry..
    aap bahut achha dil ko chhune vala …
    meri shubhkamnayen hamesha aapake saath he.


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