व्यक्तित्व विकास…

बच्चा अपनी बीमार दादी से मिलने ापने गांव नही जा पाता,
वो अपने बूढ़े दादा जी के पास जरा सा भी नही बैठ पाता!
वो ऐसा नही कर पाता क्यों कि उसे-
खूब पढ़ना है, आगे बढना है!
हर विधा मे माहिर होने के लिये उसकी तरह तरह की क्लास है,
मै समझ नही पाती , जो सामाजिकता से ही दूर करे , वो कैसा विकास है ?
वो अपने चचेरे भाई की शादी मे शामिल नही हो पाता,
गांव मे अपना पुश्तैनी खेत देखने नही जा पाता,
वो ऐसा नही कर पाता, क्यों कि हर समय उसकी कोई न कोई परिक्षा है,
लेकिन जो जीवन मूल्य ही न सिखा पाए, वो कैसी शिक्षा है ?

विकसित होते होते ये बच्चे, निज मे ही घुल जाते हैं,
गांव, दादी, मामा मौसी सब भूल जाते हैं!
खुद तो सच्चे रिश्ते बना नही पाते,
बने रिश्ते निभा नही पाते,
जीवन के अन्त मे इनके पास एक भूतहा बंगला और खूब धन भी होगा,
लेकिन बीमार पड़े तो पास बैठने को एक जन नही होगा.

मै इस तरह की शिक्षा और विकास को व्यर्थ मानती हूं,
और इस पीढ़ी के बच्चों से ये कहना चाह्ती हूं -
वे थोड़ा वक्त अपने वृद्ध दादा  के साथ बिताएं,
दादी के लिये पूजा के फ़ूल लेकर आएं,
बुआ को कुछ दिन अपने घर बुलाएं,
कुछ त्यौहारों को अपने गांव मे मनाएं,
सांस्कृतिक मूल्यों को अच्छी तरह निभाएं!
अगर ये ऐसा कर पाए ,
तो न ही इन्हे “पर्सनालिटी डेवलपमेन्ट” की कोई क्लास लगानी होगी,
और न ही खुश रहने के लिये किसी “लॊफ़िंग क्लब” की मेम्बरशिप पानी होगी!
जीवन मे पूर्ण सफ़ल होने के लिये थोड़ी समाजिकता जरूरी है,
सिर्फ़ खुद ही के लिये जिये तो जिन्दगी अधूरी है !
सिर्फ़ खुद ही के लिये जिये तो जिन्दगी अधूरी है !!
————————

Published in: on जनवरी 7, 2012 at 9:07 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (11s)  

रीत……

मां उस बेटे के संग रहती, जिसकी ज्यादा थी न कमाई,
मां थोड़ी गुमसुम सी हो गई, नन्हे की चिट्ठी जो आई,
नन्हे ने अपनी प्रगती की खबर थी मां को भिजवाई,
मां के आंसू थम न सके जब मां ने वो चिट्ठी पढ़वाई!
बेटे ने लिखा था-
दस लाख की लागत से, मां मैने है फ़ैक्ट्री बनवाई,
कल उसके उद्घाटन मे कुछ पूजा थी मैने करवाई,
चाह रहा था तुम्हे बुलाना, पर देखो कितनी मंह्गाई,
बहू को भी वक्त नही है, बच्चों की है खूब पढ़ाई!
इस पार्सल संग भेज रहा हूं, तुम्हे और भैया को मिठाई

मां यह सुन बेचैन हो उठी, उसकी फ़ूट पड़ी रूलाई,
भैया भी कुछ दुखी हुए पर फ़िर भी दे रहे थे वो दुहाई -
मां! क्यूं छोटा मन करती हो, देना चाहिये तुम्हे बधाई!
मां बोली-
मुझको तो भूला, भूल गया वो अपना भाई ?
जिस भाभी ने स्नेह दिया है, उसकी भी उसे याद न आई ?
मेहनत से उसे बड़ा किया है, उसकी ये कीमत है चुकाई ?

अब भाभी धीरे से बोली , खुद को थी वो रोक न पाई -
मां! हमसे ही भूल हुई है, जाने क्यूं थी आस लगाई,
नन्हे ने क्या गलत किया है, दुनिया की ही रीत निभाई !!
———

Published in: on दिसम्बर 28, 2011 at 9:07 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (3s)  

क्या पता मै कौन हूं!

” हमारी फ़ितरत ही ऐसी है कि
एक जैसी ठहर नही पाती है!
हर नये दिन के साथ वो भी बदल जाती है! ! :)

क्या पता मै कौन हूं!
वाणी या कि मौन हूं!
मै एक उजली आस हूं,
मै एक अथक प्रयास हूं!
अलगाव हूं, रूझान हूं,
जिम्मेदारी हूं, एहसान हूं!
मै सतह हूं, थाह हूं,
शक्ति मै अथाह हूं!
मै दुख हूं, हर्ष हूं,
साहस हूं, संघर्ष हूं!
प्रचूर हूं, अल्प हूं,
प्रयोग का प्रकल्प हूं,
समस्या हूं, विकल्प हूं!
मै एक द्रूढ संकल्प हूं!
मै एक तीव्र चाह हूं,
खुद ही अपनी राह हूं!
मै प्यार का सम्बन्ध हूं,
या कि मै अनुबन्ध हूं!
मै कर्म हूं और साधना,
और मै आराधना!
मै काव्य हूं और छन्द हूं,
और मै निबन्ध हूं!
आरंभ हूं और अन्त भी,
सूक्ष्म हूं, अनन्त भी!
कही गयी, अभिव्यक्त हूं,
या कि मै अव्यक्त हूं!
सत्य हूं, और स्वप्न हूं
भाग्य हूं, प्रयत्न हूं!
सफ़ल भी हूं, विफ़ल भी हूं,
प्रश्न मै और हल भी हूं!
कठिन हूं मै, सरल भी हूं,
कठोर भी, तरल भी हूं!
गूथी हुई, उलझन भी हूं,
और मै सुलझन भी हूं!
विचार की उत्प्रेरणा ,
मै कर्म की हूं प्रेरणा!
न्यून हूं, समग्र भी,
शांत हूं, और व्यग्र भी!
वेदना, संवेदना हूं
जड़ भी हूं, हूं चेतना!
सुनहरी उजास हूं !
मै आम नही खास हूं !! :)

Published in: on दिसम्बर 16, 2011 at 8:11 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (8s)  

खास नही, आम हूं…..

हर तरह से तमाम हूं
मै खास नही, आम हूं!!
मै, मै हूं,
अनगिनत विचारों की कै हूं!
न पक्ष हूं, न विपक्ष हूं,
मै अपना ही गौण कक्ष हूं!
सवालों की फ़सल सींचता हूं,
हर खड़े हुए को खींचता हूं!
जवाबों का टोटा ( scarcity) हूं,
बिन पेंदे का लोटा हूं!
जिसे हर कोई बजा ले, मै वो धुन हूं,
गेहूं के साथ पिस जाने वाला घुन हूं!
रफ़्तार की लगाम हूं,
प्रगती पर लगा जाम हूं!
मै एक उजली आस हूं,
मै एक अथक प्रयास हूं!
मै अलगाव हूं, रूझान हूं,
जिम्मेदारी हूं, एहसान हूं!
तर्क, वितर्क, कुतर्क मेरा काम है,
बुद्धी नही विचारजीवी मेरा नाम है!!
…….

Published in: on दिसम्बर 15, 2011 at 9:17 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (7s)  

नेता और जनता

कहने को दोनो इन्सां हैं, पर फ़िर भी थोड़ा फ़र्क यहां,
वो पाते हैं मै खोता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!

ना बाढॆं उन्हे बहा पातीं, ना सूखे से विचलित होते,
ना गर्मी से भी गलते हैं, ना भूकंपों से ढहते वे,
वो बच जाते मै मरता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!!

हर सुविधा उनके पैरों मे, हर दुविधा को सहता हूं मैं,
ना सुनने की फ़ुर्सत उनको, जो दुख अपने कहता हूं मै,
वो वक्ता हैं मै श्रोता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!!

सारी खुशियां उनकी अपनी, मेरे हिस्से बस दुख आते,
उनके बच्चे तो मौज करें, मेरे बच्चे भोखे सोते,
वो हंसते हैं, मै रोता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!!

ना उन्हे किसी की चिन्ता है, काले कामों को करते वे,
चाहे जिये मरे कोई बस अपना घर भरते हैं वे,
वो खाते हैं मै बोता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!!

वो कई गुनाह पचा जाते, मै हर गलती की सजा पाता,
अफ़सर, कानून, पुलिस उनकी, मै चिल्लता ही रह जाता,
वो निर्भय हैं मै डरता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!!

दुनिया भर की दौलत उनकी, हर मॊडल की कारें उनकी,
हैं कई कई महल उनके मेरा कमरे भर घर भी नही,
वो बड़े बहुत मै छोटा हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!!

कहने को दोनो इन्सां हैं, पर फ़िर भी थोड़ा फ़र्क यहां,
वो पाते हैं मै खोता हूं, वो नेता हैं, मै जनता हूं!

————-

Published in: on जुलाई 28, 2011 at 10:58 पूर्वाह्न  टिप्पणियाँ (12s)  

आजादियां…………….

* बाहर से आजाद दिखूं, पर,
अन्दर से हूं अब भी बन्द!
तुम कहते हो सुलझ गया सब,
पर बाकी है अब भी द्वन्द!!
——-
* वो, जो हर दिन अपनी आजादियों की सीमा लांघते हैं,
मुझसे मेरी आजादियों का हिसाब मांगते हैं!!
———
* आजादियां भी बन्धनो को ढोती हैं,
उनकी भी अपनी सीमाएं होती हैं,
और तब उनके कोई मायने नही रह जाते,
जब वे अपनी जिम्मेदारियों को खोती हैं!
——-
* आजाद तो मै तब होउंगी,
जब अपनी सीमाएं खुद तय कर सकूं!
जब अपनी मन्जिलें खुद गढ सकूं!
जब अत्याचारों से खुद लड़ सकूं!!
———-
* उसे ऊंचाईयों से इतना दूर रखा गया कि,
वो चढना भूल गया!
दमन से वो इस तरह टूटा कि,
वो लड़ना भूल गया!
कैद से छोड़ने मे इतनी देर कर दी कि,
जब छोड़ा, वो उड़ना भूल गया!!
————
* जो मिला अपना सा मुझको,
बात दिल की कह गई,
शब्द जो सब बन्द थे अन्दर,
खुल के बात बह गई !!
————

Published in: on अप्रैल 12, 2011 at 4:27 अपराह्न  टिप्पणियाँ (6s)  

रंग…….

……. मोहन ने अपने पडोसी हामिद पर केशरिया रंग डाला और हामिद ने मोहन पर हरा रंग डाला …
ये देखकर मोहन की अम्मा ने कहा – अच्छा है इन्होने एक दूसरे के रंग को स्वीकार कर लिया…….
हामिद की अम्मी बोली – हां! वरना ये दोनो लाल होते और हम काले! …..

Published in: on मार्च 25, 2011 at 6:12 अपराह्न  टिप्पणियाँ (9s)  

दोस्त और दोस्ती के लिये…

हां जी हां!! जानती हूं कि आज मित्रता दिवस नही है, लेकिन दोस्त और दोस्ती एक दिन के लिये तो नही होती ना! बल्कि हमेशा के लिये होती है तो आज कुछ पन्क्तियां दोस्त और दोस्ती के लिये…

” उलझन मे हूं, या दुख मे मै,
दोस्त है मेरा, फ़िक्र करेगा!

दूर है फ़िर भी भूलेगा ना,
कभी तो मेरा जिक्र करेगा! “
————

” दुनिया में कहीं भी होता हो मगर,
दोस्त का घर दूर कहाँ होता है!
जब भी चाहूँ आवाज लगा लेता हूँ,
वो मेरे दिल मे छुपा होता है!
जाने कैसे वो दर्द मेरा जान लेता है,
दुखों पे मेरे वो भी कहीं रोता है!”
—————–

“यूं तो कहने को परिवार, रिश्तेदार साथ हैं, जिन्दगी बिताने को,
फ़िर भी एक दोस्त चाहिये, दिल की कहने- सुनने, बतियाने को!! “
——————-

” हर कोई ऐसा एक मित्र पाए,
जो बातें सुनते थके नही,
और मौन को भी जो पढ जाए!! “
———————

” पुराने दोस्त और दोस्ती हमारे पुराने गांव की तरह होते हैं.. बरसों बाद जब हम फ़िर उनसे मिलते हैं तो कुछ बदल जाते हैं, लेकिन बहुत कुछ पहले की तरह ही होते हैं.. “
———-

** और अब कुछ पन्क्तियां और, जो किसी मित्र से ही कही जा सकती है.:) किसी बात पर मैने अपने मित्र से कही थी….

” आत्म ज्ञान से इतना भी तृप्त मत हो जाइये कि और कुछ जानने कि ख्वाहिश ही न रहे,
गर्व से इतना भी मत बिगड़ जाईये कि सुधार की गुंजाइश ही न रहे!! “

” ज्ञानी होने ( दिखने) के चक्कर मे जमाना tense बहुत है,
हम तो कहेंगे,
सबसे उपर रहने के लिये common sense बहुत है!! “

” किसी की बात समझ न सको तो इतना न बौखलाइये!
बेहतर है आप अपनी समझ को समझाइये!! “
———————

Published in: on जनवरी 12, 2011 at 10:12 अपराह्न  टिप्पणियाँ (28s)  

अब नये पैक मे!! :)

मित्रों, आज प्रस्तुत है मेरी दो पुरानी पोस्ट पॊडकास्ट रूप मे. यानि माल वही पुराना बस पैक नया है :)

*** ये खास कर मेरे पुराने ब्लॊगर मित्रों के लिये है, जो भूल गये हैं कि उन दिनों मैने कुछ अच्छी अच्छी पोस्ट लिखी थी …. वो मजे मजे के दिन थे.. :)

पहला पॊडकास्ट है “एक मुलाकात एक फ़ैसला
* पढने के लिये यहां देख सकते हैं - राम से मुलाकात , जिसे मैने २८ सित. २००७ को प्रकाशित किया था .


————

दूसरा पॊडकास्ट है ” चुनाव
* पढने के लिये यहां देख सकते हैं – चुनाव जिसे मैने ९ जन. २००७ को प्रकाशित किया था .

—————–

Published in: on जनवरी 5, 2011 at 10:37 अपराह्न  टिप्पणियाँ (4s)  

स्मृति-शेष……

मुझसे क्यूँकर तुम हुई बडी,
तारों मे जाकर हुई खडी,
मेरी बेटी तुम थी विशेष,
मेरी पूँजी ये स्मृति शेष….

रहती हो तुम वो कौन जहाँ?
कैसे ढूँढू मै तुम्हे, कहाँ?
चिन्ता होती है मुझे यहाँ,
है कौन तुम्हारे सँग वहाँ?
क्या इस जग से बेहतर वो देश?
मेरी पूँजी….

थी सौम्य, शान्त और अति गम्भीर,
आँखों मे डबडब भरा नीर!
थी तुम्हे सदा सादगी पसन्द,
नटने थटने का नही छन्द,
लम्बी चोटी, रेशमी केश!!
मेरी पूँजी…..

कपडों मे ज्यादा सूती पहना,
गहने का धातु बस सोना,
न ‘जन्क फूड’ न ‘फास्ट फूड’,
न चमक दमक, न शोर गुल,
साधा खाना, साधा परिवेश!!

“रो मत आ चल हम तुम खेलें,
मेरी टॉफी भी तू ले ले”
छोटी से ये सब कहे कौन?
है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
मेरी पूँजी….

मै लिखती, तुमको दिखलाती,
तुम मुँह बिचका कर यूँ कहती-
“ये पन्क्ति यहाँ पर ठीक नही,
हाँ!दूजी पन्क्ति है खूब कही!”
तुम होती थी पहली पाठक,
तुम होती मेरी सम्पादक!
तुमको न भा जाए जब तक,
तुम पास न करती मुझे तब तक!
अब लेखन है जैसे अवशेष..
मेरी पूँजी….

उस दिन दुकान मे जब देखा,
दुबला-पतला, नन्हा बच्चा,
सहमा सा था, कुछ सकुचाया,
था डरा हुआ, कुछ घबराया.
मजबूरी मे कर रहा काम,
बचपन उसका था यूँ तमाम,
देख उसे तुम दुखी हुई,
नन्हे दिल मे करुणा उपजी-
“माँ!इसको कुछ पैसे दे दो,
मेरा ये पेय इसे दे दो”
त्याग को तुम हरदम तत्पर,
जैसे हो कोई ” सन्त- मदर”!
वो घूँट गले मे ही अटके,
मोती जैसे आँसू टपके.
उस पल ही उस पेय को त्याग दिया,
जीवन भर फिर वो नही छुआ.
जब कर लेती तुम दृढ निश्चय,
फिर ना बदलोगी, ये था तय,
था प्रेम सदा, न कभी द्वेष!
मेरी पूँजी…..

है दुखद बहुत तुमको खोना,
इतनी जल्दी भी क्या जाना,
बातें करती, कुछ कहती तो,
कुछ देर को जरा ठहरती तो,

याद तुम्हारी जब आये
मन मेरा बेहद घबराये
इतना मुझे रुलाओ ना,
इतनी दूर को जाओ ना,
तुम बिन जीना मैं जानू ना,
वापिस आओ, आ जाओ ना।

तुम चली गई हो किस विदेश?
मेरी पूँजी….

तुम बिन, बोलो कैसे जीना?
कितने आँसू, कब तक पीना?
वक्त के साथ न कम होता,
ये दर्द और भी गहराता…
इस जीवन से अब हुआ विद्वेश..
मेरी पूँजी…….

——————-
कबीर का एक भजन मेरी आवाज मे.. जिसे पूर्वी ने ही मुझे ठीक से गाना सिखाया था….

——————-
एक धुन –


———————-

Published in: on दिसम्बर 12, 2010 at 5:26 अपराह्न  टिप्पणियाँ (9s)  
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.