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चुनाव…….. January 9, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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पिछले कुछ दिनों से हिन्दी चिट्ठा-जगत मे श्रेष्ठ चिट्ठाकार के चुनाव की चर्चा रही..कई चिट्ठे और टिप्पणियाँ चुनाव को समर्पित रहे…चुनाव के नतीजे भी आ गये, जो लोग चुनाव मे जीते हैं वो श्रेष्ठ तो पहले से ही थे अब प्रमाणित श्रेष्ठ हो गये हैं!!
इधर महाराष्ट्र मे भी चुनाव की गहमा गहमी है..आईये आपको दिखाती हूँ एक गाँव का दृष्य, जहाँ नेता जी चुनाव के दौरान आने वाले हैं……

गाँव मे खेला जाने वाला था वोट माँगने का खेला,
सारे गाँव मे था लोगों का रेला ही रेला,
मानों गाँव मे लगा था बडा सा मेला,
हर तरफ भीड थी, झमेला ही झमेला!

सरकारी महकमा फूला नही समाया,
कई दिनों बाद, अब हरकत मे आया!

गाँव का रामू, सीधा-साधा इन्सान,
इतनी हलचल देखकर खूब था हैरान!
रामू ने गाँव के समझदार की तरफ दौड लगाई,
उसे अपनी सारी जिज्ञासा बत्ताई.
पूछा-
‘गाँव को ये क्या हो गया है?
दो ही दिन मे इतना कैसे बदल गया है?
क्या कहीं से कोई आ रहे हैं?’

मुखिया ने कहा-
‘हाँ भाई हाँ! कई नेता पधार रहे हैं!

रामू ने पूछा-
‘नेता कैसे होते हैं?’

मुखिया बोले-
‘कहने को तो इन्सान जैसे ही होते हैं!
झकाझक कपडे, पेट सामान्य से बडे होते हैं!
आस-पास कई चेले और सन्तरी खडे होते हैं!
सफेद कपडे हैं, क्यों कि उनमे कर्मों के दाग छुपाना है!
पेट बडे हैं, क्यों कि उनमे घोटालों को समाना है!!’

रामू बोला-
‘क्या इनके आने से अपनी हालत बदलेगी?’

मुखिया ने जवाब दिया-
‘ पागल हो क्या? हमारी हालत तो वैसी ही रहेगी!
बदलनी ही है तो इन्ही की बदलेगी!!
ये भला हमे क्या देंगे?
उलटे हमसे वोट ले लेंगे!
ज्यादा से ज्यादा एक सडक बनवाएँगे,
और उसके नाम पर सालों तक वोट हथियाएँगे!

रामू बोला-
‘सुना है इनकी कृपा से गाँव का भला होता है?’

मुखिया बोले-
‘एसा वही कहता है, जो इनका पला होता है!!
इनकी बातों का तू मत होने दे असर,
यकीन करना ही है तो अपने आप पर कर!!
तू क्या समझता है? ये किस्मत बदल देंगे?
जो भगवान ने नही किया, वो ये कर देंगे?
इनके बहकावे मे तू बिल्कुल मत आना!
कहीं का नही रहेगा, जो इनकी बात माना!!

अब रामू सब कुछ समझ गया…उसने ये कहा—
तो ये वही हैं, जो देश को —- रहे हैं?’
ओह!! शहर तो निगल गये, अब गाँव —– आ रहे हैं!!!!
——————-

अन्त मे श्रेष्ठतम चिट्ठाकार ‘समीर जी’ को ये पन्क्तियाँ भेंट करना चाहती हूँ!
(** समीर जी, आपकी(और मेरी भी!) एक पुरानी पसंदीदा कविता की पन्क्तियाँ बदलकर कुछ लिखा है, आशा ही नही, विश्वास भी है कि आप इसे “अन्यथा” नही लेंगे!)

जनता मुझको कुर्सी दे दे , मै नेता बन जाऊँगा,
अपनों को बाँटूंगा दौलत, मै भी धनी हो जाऊँगा!

काम-धाम कुछ नही करूँगा, मौज-मजे और एश करूँगा,
एक मुझे तू माईक ला दे, भाषण खूब सुनाऊँगा!
जनता मुझको—

कलफ लगे कपडे पहनूँगा, कई-कई कारें रखूँगा,
प्लेन का तू टिक़िट दिलवा दे, विदेश सैर कर आऊँगा!
जनता मुझको—-

अतिक्रमण कर घर बाधूँगा, विदेशों मे खाते खोलूँगा,
एक बार मन्त्री बनवा दे, जीवन भर सुख भोगूँगा!!
जनता मुझको—-
—————

Comments»

1. समीर लाल - January 9, 2007

अरे, रचना जी, आप इतना बेहतरीन लिख रहीं हैं, अन्यथा लेने का तो प्रश्न ही नहीं उठता.

मजा आ गया.

वैसे भी जब कोई मेरा नाम लिखकर पोस्ट में लाता है तो मै अति प्रसन्न हो जाता हूँ और इसे एक पासपोर्ट के रुप में स्विकार करता हूँ कि अब हम भी आपका नाम इस्तेमाल कर सकेंगे, गाहे बगाहे, आवश्यकतानुरुप..हा हा….डरें मत, ज्यादा खिंचाई नहीं की जायेगी बस मौके की बात है कब … :) :) अन्यथा न लें. मैने भी नहीं लिया.

2. Shrish - January 9, 2007

वाह एकदम सही कविता। अगर कोई नेता वादे करके पूरे कर दे तो शक होने लगेगा कि वो नेता ही नहीं। :)

3. Divyabh - January 9, 2007

Hi,Beautiful Poem on Netas I guess u hv felt the condition n the crisis from very close quarter.good work

4. उन्मुक्त - January 10, 2007

समीर जी ने सच कहा, ‘वैसे भी जब कोई मेरा नाम लिखकर पोस्ट में लाता है तो मै अति प्रसन्न हो जाता हूँ’।
यह प्रसन्नता तो हम सब चाहते हैं पर यह सबके नसीब में नहीं।

5. अनूप शुक्ला - January 10, 2007

चुनाव चर्चा बढि़या की है। लेकिन आप उन्मुक्तजी, शुऐब भाई और सागरजी की पीड़ा भी समझें। उनके लिये भी कुछ लिखें। आखिर वे भी तो हैं (जीतने वाली) टीम में! समीरजी ने जैसा आपने बताया वैसा ही करना शुरू कर दिया और ऐश करने लगे इसलिये आजकीचिट्ठाचर्चा हमारे पल्ले आ गयी! :)

6. rachana - January 10, 2007

@ समीर जी, आपको पासपोर्ट देकर तो मुसीबत ले ली मैने! डर तो लग रहा है..अब पता नही कब और कैसे खिंचाई होगी मेरी!

@ श्रीश जी, धन्यवाद.

@ दिव्याभ, धन्यवाद पसन्द करने के लिये.

@ उन्मुक्त जी, आप नसीब की बात कहाँ करने लगे?? जल्दी ही आपका नाम भी होगा!
और आपको भी जीत पर हार्दिक बधाई!

@ अनूप जी, जीतने वालों की भी कोई पीडा होती है क्या? पीडा तो हारने वालों की हुआ करती है!!
शुएब भाई और सागर भाई के लिये जब कुछ कहने को होगा तो जरूर कहेंगे.उन्हे भी बधाई तो है ही!

** समीर जी का जिक्र मैने सिर्फ इसलिये किया है कि, जिस कविता की पन्क्तियाँ मैने बदली है उसी पुरानी कविता को समीर जी नेट पर खोज रहे थे और मैने उन्हे वो कविता भेजी थी*

7. Tarun - January 11, 2007

नेताओं के लिये बिल्कुल सही लिखा है, अच्छी खिंचाई की सुन्दर कविता के माध्यम से

8. rachana - January 13, 2007

@ तरुन जी, शुक्रिया.

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